फोटो : 46

संवाद सहयोगी,नारनौंद : अग्रवाल परिवार द्वारा आयोजित सिसाय गांव के कालीरामण चबूतरे पर आचार्य राघवेंद्र सरकार द्वारा आज छठे दिन की भागवत कथा में विवाह का प्रसंग सुनाया गया। आचार्य राघवेंद्र ने बताया कि श्री कृष्ण के पास जब किसी द्वारा रुक्मणी ने संदेश भेजा था कि मेरे घर वाले मेरा विवाह कहीं और करना चाहते हैं। तब उन्होंने श्री कृष्ण से कहा वह श्री कृष्ण से ही विवाह करना चाहती है। क्योंकि विश्व में उनके जैसा अन्य कोई पुरुष नहीं है। भगवान श्री कृष्ण के गुणों और उनकी सुंदरता पर मुग्ध होकर रुक्मणी ने मन ही मन निश्चय किया कि वह श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी को भी पति के रूप में वरण नहीं करेंगी। उधर श्री कृष्ण भगवान को भी इस बात का पता लग चुका था कि रुकमणी परम रूपवती तो है ही इसके साथ साथ परम सुलक्षणा भी है। अपने वर्णन में उन्होंने बताया कि भीष्मक का बड़ा पुत्र रुकनी भगवान श्री कृष्ण से शत्रुता रखता था। वह अपनी बहन रुक्मणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था। जब रुकमणी ने गिरजा की पूजा करते हुए उनसे प्रार्थना की हे मा तुम सारे जगत की मां हो। इसलिए मेरी भी अभिलाषा पूर्ण करो मैं श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती। रुक्मणी जब मंदिर से बाहर निकली तो उन्हें एक ब्राह्मण दिखाई दिया। जिसे देखकर वह बहुत प्रसन्न हुई। उन्हें यह समझने में बिल्कुल भी संशय नहीं रहा कि श्री कृष्ण भगवान ने ही उसके समर्पण को स्वीकार कर लिया है और श्री कृष्ण जी ने विद्युत तरंग की भांति पहुंचकर उनका हाथ थाम लिया और अपने रथ पर बिठाकर द्वारका की ओर चल पड़े।

भगवान श्री कृष्ण रुकमणी को द्वारका ले जाकर उनके साथ विधिवत विवाह किया। आचार्य ने बताया कि प्रद्युम्न उन्हीं के गर्भ से उत्पन्न हुए थे जो सृष्टि में कामदेव के अवतार थे। श्री कृष्ण की पटरानियों में रुक्मणी का सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान था। उनके प्रेम और उनकी भक्ति पर भगवान श्री कृष्ण मुग्ध थे। उनके प्रेम और उनकी कई कथाएं और भी बहुत प्रेरक हैं। कथा में श्रोताओं द्वारा रुक्मणी कृष्ण विवाह की झांकी पर फूल वर्षा की गई।

Edited By: Jagran