हरियाणा: हजारों वर्ष पुरानी मुहर बनी रोजगार का जरिया, राहुल के हुनर से ड्राइंग रूम तक पहुंची राखीगढ़ी
जींद के राहुल कालवा राखीगढ़ी की हजारों वर्ष पुरानी बैल अंकित मुहर की प्रतिकृतियां बनाकर रोजगार का जरिया बन गए हैं।

मिट्टी की मुहर तैयार करता है राहुल (जागरण फोटो)
HighLights
राहुल कालवा बना रहे राखीगढ़ी की प्राचीन बैल मुहर प्रतिकृति।
ये प्रतिकृतियां सरकारी कार्यक्रमों में स्मृति चिह्न बन रही हैं।
सरकारी नौकरी छोड़, राहुल ने 50 हजार मुहरें बेचीं।
सुनील मान, नारनौंद। राखीगढ़ी की खोदाई में मिली हजारों वर्ष पुरानी बैल अंकित मुहर कभी व्यापारिक गतिविधियों में पहचान का माध्यम रही होगी, अब उसी की प्रतिकृति एक युवा के रोजगार की पहचान बन गई है।
जींद जिले के गांव कालवा निवासी मिट्टी कलाकार राहुल अपने हाथों से इस मुहर की हूबहू प्रतिकृति तैयार कर रहे हैं। फ्रेम में सजी ये मुहरें सरकारी कार्यक्रमों में स्मृति चिह्न के रूप में भेंट की जा रही हैं, जबकि पर्यटक इन्हें राखीगढ़ी की ऐतिहासिक निशानी के रूप में अपने घरों के ड्राइंग रूम में सजा रहे हैं।
राहुल करीब सात वर्ष पहले अपने पिता के साथ राखीगढ़ी आए थे। यहां तत्कालीन सरपंच दिनेश श्योराण ने उन्हें खोदाई में मिली मुहर की प्रतिकृति बनाने का सुझाव दिया।
राहुल ने तस्वीर देखकर मिट्टी पर बैल की आकृति उकेरने के कई प्रयास किए। पहला सफल नमूना तैयार होने के बाद उसे दो दिन सुखाया और फिर भट्ठी में पकाकर मजबूत किया।
राहुल केवल मिट्टी की मुहर करता है तैयार
राखीगढ़ी में आयोजित एक कार्यक्रम में जब यह प्रतिकृति प्रदर्शित की गई तो लोगों ने इसे खूब पसंद किया। शुरुआत में राहुल केवल मिट्टी की मुहर तैयार करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने इसे आकर्षक फ्रेम में सजाकर नया स्वरूप दिया। इसके बाद पुरातत्व विभाग के आयोजनों में भी इसका प्रयोग स्मृति चिह्न के रूप में होने लगा। राहुल के अनुसार जी-20 से जुड़े कार्यक्रम में भी ये प्रतिकृतियां गणमान्य लोगों को भेंट की गई थीं।
सरकारी नौकरी की तैयारी छोड़ी, अब दूसरों को दे रहे काम
राहुल कालवा ने बताया कि कभी वह सरकारी नौकरी पाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन राखीगढ़ी की मुहर ने उनके जीवन को नई दिशा दे दी। मांग बढ़ने पर उन्होंने मिट्टी से चूड़ियां, हार और अन्य सजावटी वस्तुएं बनानी भी शुरू कर दीं। उनका दावा है कि अब तक वह करीब 50 हजार मुहरें बेच चुके हैं।
इनमें करीब 10 हजार मुहरों को फ्रेम में सजाकर सरकारी आयोजनों के लिए उपलब्ध कराया गया है। काम बढ़ने के साथ वह अन्य युवाओं और महिलाओं को भी मिट्टी कला से जोड़कर रोजगार देने का प्रयास कर रहे हैं। पुरातत्व और हुनर का यह मेल विरासत को घर-घर पहुंचा रहा है।
