जेएनएन, हिसार। भारत में टेक्सटाइल उद्योग को करीब 75 प्रतिशत कच्चे माल की आपूर्ति कपास से ही होती इस बार केन्द्रीय भारत में वर्षा की कमी के चलते कपास के उत्पादन में गिरावट आई थी। यह बहुत संतोष की बात है कि उत्तरी भारत विशेषकर हरियाणा और पंजाब में उत्पादन और कपास के अंतर्गत क्षेत्र में वृद्धि हुई है। यहां पिछले काफी वर्षों से सफेद मक्खी के प्रकोप के कारण किसान बेहद निराश थे। यह बात भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सीआइसीआर के डायरेक्टर डा. वीएच वाघमरे ने कही। वे सोमवार को चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में जैनेटिक्स एवं प्लांट ब्राडिंग विभाग के कपास अनुभाग द्वारा आयोजित कपास की ऑल इंडिया कोर्डिनेटिड रिसर्च प्रोजेक्ट की उत्तर क्षेत्रीय वार्षिक समूह बैठक में बतौर विशिष्ट अतिथि शिरकत कर रहे थे। इस दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहे।

 उन्होंने कहा कि कृषि वैज्ञानिकों को कपास उत्पादन में किसानों की लागत कम करने और किसानों को इसकी अनुकूल किस्मों की खेती करने के अलावा कपास की ब्रांडिंग और कंट्रेक्ट फार्मिंग के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। कपास उत्पादन में 50 फीसद खर्च केवल लेबर पर होता है, वैज्ञानिकों को विशेषकर इस खर्च को घटाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। परियोजना के संयोजक डा. एएच प्रकाश ने पिछले वर्ष विभिन्न केन्द्रों पर किए गए कपास अनुसंधानों की रिपोर्ट प्रस्तुत की। इससे पूर्व विश्र्वविद्यालय के अतिरिक्त अनुसंधान निदेशक डा. नीरज कुमार ने मुख्य अतिथि एवं प्रतिभागी वैज्ञानिकों का स्वागत किया।

उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में उत्तरी भारत में कपास अनुसंधान केन्द्रों सहित कपास क्षेत्र से जुड़ी निजी कंपनियों से आए करीब 150 वैज्ञानिक व प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। एग्रीकल्चर कालेज के डीन डा. केएस ग्रेवाल ने धन्यवाद प्रस्ताव ज्ञापित किया। इस दौरान विश्ववद्यालय के पौध प्रजनन विभाग के अध्यक्ष डा. आईएस पंवार व कपास अनुभाग के अध्यक्ष डा. आरएस सांगवान सहित डीन, डायरेक्टर, अधिकारी एवं वैज्ञानिक उपस्थित थे।

वैज्ञानिकों को लकीर से हटकर सोचना होगा : कुलपति

कुलपति प्रो. केपी ङ्क्षसह ने फिनलैंड की एक कंपनी का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कंपनी ने धान के पुआल और कपास की बछेटी से भी रेशा तैयार करने में सफलता पाई है। इसलिए कृषि वैज्ञानिकों को लकीर से हट कर सोचना होगा और मल्टीनेश्नल कंपनियों की चुनौतियों का जवाब देने और किसानों के आर्थिक लाभ के लिए नई उन्नत प्रौद्योगियां विकसित करनी होंगी। उन्होंने कहा कि पौध प्रजनन की पारम्परिक विधि से फसल की नई किस्म के विकास में तीन से छह वर्ष लगते हैं, जोकि बहुत लंबा समय है। इस समय अवधि को भी कम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा उन्नत उत्पादन में गैर सरकारी और मल्टीनेशनल कंपनियां बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं और पौध प्रजनन वैज्ञानिकों को चुनौती दे रही हैं।

Posted By: manoj kumar

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