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Reel में उलझी Real जिंदगी: घर में आमने-सामने चुप्पी, सोशल मीडिया के भरोसे चल रहा पेरेंट्स-बच्चों का रिश्ता

Published: Tue, 08 Sep 2026 01:29 PM (IST)

अभिभावक और बच्चों के बीच सीधा संवाद कम होने से रिश्ते की डोर कमजोर हो रही है, जिससे वे इंस्टाग्राम पर मैसेज कर रहे हैं।

अभिभावक व बच्चे आमने-सामने संवाद करने की बजाय इंस्टाग्राम पर ही एक-दूसरे को मैसेज कर रहे हैं।

अभिभावक व बच्चे आमने-सामने संवाद करने की बजाय इंस्टाग्राम पर ही एक-दूसरे को मैसेज कर रहे हैं।

जागरण संवाददाता, हिसार। बदलते दौर में एक ही छत के नीचे अभिभावक और बच्चे के बीच रिश्ते की डोर कोसों दूर है। जहां अभिभावक अपने विचारों व अपेक्षाएं बच्चों पर थोंपने में लगे है तो दूसरी ओर बच्चे इस दबाव से बचने के लिए पूरा दिन सोशल प्लेटफार्म व इंस्टाग्राम पर समय बर्बाद करने में लगे है। नतीजन, अभिभावक व बच्चे आमने-सामने संवाद करने की बजाय इंस्टाग्राम पर ही एक-दूसरे को मैसेज कर रहे हैं।

परिणामस्वरूप, दोनों के बीच विचारों के टकराव होने से भावनाएं तक हताहत हो रही है। जोकि एक खतरे का संकेत है। बेहतर होगा कि अभिभावकों व बच्चे प्रत्यक्ष रूप से संवाद करें, जिससे न केवल समस्याओं का निवारण होगा अपितु भावनाओं का संतुलन भी बना रहेगा। ये कहना है आथिक की फाउंडर एवं लेखिका पूजा मारवाह का।

वे सोमवार को टैक्सी स्टैंड समीप एक निजी होटल में दैनिक जागरण के सहयोग से अहसास वुमन आफ हिसार मुहिम के तहत द राइट सर्कल विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रही थीं। कार्यक्रम का संचालन अहसास वुमन आफ हिसार की सदस्य रिया मलिक ने किया। जबकि नेहा काजल ने अहम भूमिका निभाई। कार्यक्रम में 35 अभिभावक शामिल रहे। हिसार यूनिट के वरिष्ठ महाप्रबंधक राहुल मित्तल ने भी शिरकत कर उपरोक्त मुख्य वक्ता को सम्मानित किया।

रील के चक्कर में रियल से दूर हो रहे बच्चे

मुख्य वक्ता पूजा मारवाह ने बताया कि अभिभावक जहां अपनी जिम्मेदारी भूलते जा रहे हैं तो बच्चे रील के चक्कर में रियल से दूर होते जा रहे हैं। काल्पनिक भावनाओं में बहकर बच्चा कई बार सोशल प्लेटफार्म जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम पर साइबर अटैक तक का शिकार हो जाता है। लेकिन अगर अभिभावक व बच्चे का आपसी संवाद नहीं हुआ तो बड़े गंभीर परिणाम परिवार को भुगतने पड़ सकते हैं।

लोग क्या कहेंगे के चक्कर में बेटियां खो रहीं मानसिक संतुलन

अभी भी अधिकांश परिवार ऐसे है, जहां अभी भी बेटियों को रूढ़िवादी सोच से बांधकर रखा जाता है। करियर संवारने के लिए बेटी जब-जब आगे बढ़ती है तो लोग क्या कहेंगे की सोच लेकर वह न खुद आगे बढ़ पाती है और न ही परिवार उसको स्पोर्ट दे पाता है। जबकि इस स्थिति में परिवार का बड़ा रोल होता है कि वह बेटी को सही व गलत की पहचान करना सीखाएं और करियर संवारने के लिए उसको प्रोत्साहित करें।

सत्र में अभिभावकों ने किए प्रश्न, संतोषजनक मिले जवाब

कार्यक्रम के दौरान अभिभावकों ने मुख्य वक्ता पूजा से सवाल भी किए, जिसमें सर्वाधिक परेशानी अभिभावकों व बच्चे के बीच विचारों के तालमेल न होने की मिली। इसके अलावा बेटियों को सही व गलत की पहचान न होना, अभिभावकों की ओर से करियर व भावनाओं का दबाव और दूसरे के बच्चे से खुद के बच्चे की तुलनात्मक पर सवाल पूछे। जिस पर मुख्य वक्ता पूजा ने हर सवाल का संतोषजनक जवाब दिया।