बहादुरगढ़, जेएनएन। एक तरफ तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा आंदोलन लंबा खिंचता जा रहा है और दूसरी तरफ फसल का सीजन सिर पर आ गया है। गेहूं से पहले सरसों की कटाई होनी है। किसान तो यह दावा कर रहे हैं कि फसल की कटाई भी करेंगे और आंदोलन भी चलाएंगे मगर बिना मांग पूरी हुए वापस नहीं जाएंगे। फिलहाल जो हालात बने हुए हैं, उसमें कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में आंदोलनकारियों की नजर अब 28 फरवरी पर टिकी हुई है। उसी दिन संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से आगामी रणनीति का खुलासा किया जाना है। इंतजार इसी बात का है कि संयुक्त मोर्चा अब सरकार पर दबाव बनाने के लिए क्या कदम उठाता है।

अभी तक तो 27 फरवरी तक के कार्यक्रम तय हैं। शुक्रवार को आंदोलन स्थल पर नौजवान किसान दिवस मन रहा है। शनिवार को रविदास जयंती मनाई जाएगी। इसके बाद संयुक्त मोर्चा बैठक करके विचार विमर्श करेगा। माना जा रहा है कि आंदोलनकारियों के लिए सर्दी का मौसम जितना परेशानी भरा रहा है, उससे ज्यादा गर्मी सताएगी। ऐसे में आंदोलन को अब लंबा खींचना और धार देना भी चुनौती भरा होगा। पंजाब के किसान नेता प्रगट सिंह का कहना है कि वे सिर पर कफन बांधकर आए हैं। जब तक कानून रद नहीं होते, तब तक घर वापसी का कोई औचित्य ही नहीं है। सरकार चाहे जितना इंतजार करवाए मगर किसान हर मौसम और हर हालात का सामना करने के लिए तैयार हैं। तंबुओं को गर्मी के मौसम के अनुसार ढाला जा रहा है।

बता दें कि 26 जनवरी को दिल्‍ली में हुई हिंसा के बाद किसान आंदोलन कमजोर हुआ और फिर से जोर पकड़ गया था। मगर तब से लेकर अब तक सरकार की ओर से वार्ता के लिए कोई बुलावा नहीं आया है। किसान भी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। अब फसलों के भी पकने का समय आ गया है। ऐसे  में किसान एक बार फिर से आंदोलन के सक्रिय होने का इंतजार कर रहे हैं।

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