हिसार, वैभव शर्मा। गुजरात और राजस्थान सहित देश के कई राज्यों में लंपी स्किन डिजीज (एलएसडी) यानि गांठदार त्वचा रोग का प्रसार देखने को मिल रहा है। कई राज्यों में तो सैकड़ों पशुओं की मौत भी इस बीमारी से हो चुकी है। जिसमें गायें अधिक हैं। अब यह बीमारी गाय ही नहीं बल्कि दूसरे जानवरों में भी फैल रही है। ऐसी परिस्थिति में अब एक ही सहारा है कि अधिक से अधिक पशुओं को एलएसडी बचाव की वैक्सीन लगाई जाए।

खास बात है कि इस बीमारी से बचाव के लिए हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (एनआरसीइ) के विज्ञानियों द्वारा बनाई पहली एलएसडी स्वदेशी वैक्सीन रामबाण बन सकती है। मगर अभी तक इस वैक्सीन के आपातकालीन प्रयोग की स्वीकृति केंद्रीय पशुपालन मंत्रालय के स्तर पर लंबित है। इस अनुमति के बाद ही पशुओं की जान इस खतरनाक बीमारी से बचाई जा सकेगी।

अलग-अलग राज्यों में किस तरह फैली एलएसडीएसएसडी सबसे पहले अफ्रीका में पाई जाती थी। मगर वर्ष 2019 में भारत आई और इसका सबसे पहला मामला ओडिशा में मिला। इसके बाद ओडिशा के समीप के क्षेत्रों में इस बीमारी से पशु पीड़ित पाए गए। तब से लेकर अभी तक इस बीमारी का वायरस समय-समय पर अलग अलग राज्यों में फैलता रहा। इसके सुदूर के राज्यों में फैलने का सबसे बड़ा कारण पीड़ित पशुओं का एक राज्य से दूसरे राज्यों में आवागमन और दूसरे पशुओं से संपर्क में आना रहा।

पूरी तरह से तैयार है एलएसडी वैक्सीन नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (एनआरसीइ) के विज्ञानियों ने इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आइवीआरआइ) के सहयोग से करीब दो से तीन वर्ष पहले ही लंपी स्किन डिजीज पर शोध कर शुरू कर दिया था। इसके बाद इस बीमारी का रांची से सबसे पहले वायरस आइसोलेट किया और वैक्सीन तैयार की गई।

वैक्सीन बनी तो टेस्टिंग का फेज शुरू किया गया। इसके बाद नैनीताल के मुक्तेश्वर स्थित इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईवीआरआई) के क्षेत्रिय केंद्र में जानवरों को यह वैक्सीन लगाई गई है। जानवर पूरी तरह से सुरक्षित हैं। इसके बाद फील्ड ट्रायल भी किया गया जिसमें अच्छे परिणाम मिले। ऐसे में अभी तक वैक्सीन को काफी हद तक सफलता मिल चुकी है। यह देश की लंपी डिजीज की पहली वैक्सीन होगी। सबसे पहले यह बीमारी देश की पूर्वी बेल्ट में थी इसके बाद धीमे-धीमे कर मध्यप्रदेश, गुजरात और अब हरियाणा तक आ गई। हाल ही में एनआरसीई की एक टीम इस बीमारी की स्थिति देखने और जिन पशुओं को वैक्सीन दी गई है उनके सैंपल लेने राजस्थान के उदयपुर भी पहुंची थी।

आइसीएआर आपातकालीन प्रयोग को कहाइस मामले से जुड़े जानकारों की मानें तो आइसीएआर ने एनआरसीई द्वारा तैयारी एलएसडी वैक्सीन के आपातकालीन प्रयोग को सहमति जता दी है। इसमें डेयरी विभाग को भी कोई आपत्ति नहीं है। इसके साथ ही केंद्रीय पशुपालन मंत्रालय को अब इस बाबत फैसला लेना है। मौजूदा समय में यह बीमारी फैल रही है तो इस स्थिति में वैक्सीन के निर्माण के लिए कामर्शियल प्रोसेस को अपनाने में दो से ढ़ाई साल का समय लग सकता है। मगर ऐसी परिस्थिति में कुछ हद तक हिसार का एनआरसीइ और आइवीआरइ इज्जतनगर वैक्सीन बनाने की क्षमता रखता है और देश की मदद कर सकता है। अब पशुधन बचाने को फैसला शासन में बैठे अधिकारियों को लेना होगा।

कैसे होती है लंपी स्किन डिजीज

लंपी स्किन डिजीज गायों, भैंसों में एक तेजी से फैलने वाली विषाणुजनित बीमारी है। यह बीमारी पशुपालकों के आर्थिक नुकसान का प्रमुख कारण है। इस बीमारी से सभी आयु की गायें प्रभावित होती हैं। विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन ने इस ट्रांसबाउंड्री बीमारी को नोटिफाइ डिजीज की श्रेणी में रखा है। लंपी डिजीज का वायरस इंसानों में चिकनपाक्स फैलाने वाले वायरस के जैसा होता है। जिसे कैप्रीपाक्स कहा जाता है। मगर इस बीमारी के फैलने का कारण सिर्फ कैप्रीपाक्स ही नहीं बल्कि शीपपाक्स और गोटपाक्स वायरस से भी यह बीमारी फैलती है। यह बीमारी विषाणु के अलावा मच्छरों, और खून चूसने वाले चीचड़ों व मक्खियों से आसानी से फैलता है। इसके साथ ही दूषित पानी, लार और चारे के माध्यम से भी फैलता है।

यह हैं इस बीमारी के लक्षण

  • पशुओं को तेज बुखार आ जाता है और दुधारू पशु दूध देना कम कर देते हैं।
  • बुखार, लाार, आंखों, नाक से पानी आना और वजन घटना इसमें शामिल हैं।
  • लंपी त्वचा रोग में शरीर पर (खासकर सिर, गर्दन और जननांगों के आसपास) 2 से 5 सेंटीमीटर व्यास की गांठें बन जाती हैं।
  • इस बीमारी की चपेट में आई गायों, भैंसों के शरीर पर फोड़े होने लगते हैं। जिनमें पानी भरा होता है। समय पर उपचार न मिलने पर फोड़ों में घाव बन जाते हैं।- मादा पशुओं का गर्भपात हो जाता है, इसके साथ ही पशुओं की मौत भी हो जाती है।
  • कुछ मामलों में यह बीमारी नर व मादा पशुओं में लंगड़ापन, निमोनिया और बांझपन का कारण बन सकता है।

अधिकारी के अनुसार

देश के कई राज्यों में इस बीमारी से पशु परेशान हैं। इसके लिए हमारे विज्ञानियों ने एक सुरक्षित स्वदेशी वैक्सीन तैयार कर ली है। हमें उम्मीद है कि इसका प्रयोग जल्द से जल्द किया जाएगा।

----डा. बीएन त्रिपाठी, उप महानिदेशक, पशु प्रभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद।

Edited By: Naveen Dalal