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5000 साल पहले भी इस्तेमाल होता था हर्बल शैम्पू, हरियाणा के बनावली में मिले आंवला-शिकाकाई के सबूत

Published: Tue, 20 Oct 2026 10:05 PM (IST)

हरियाणा के बनावली पुरास्थल से प्राप्त बर्तनों में आंवला और शिकाकाई के अंशों ने 5000 साल पुरानी हर्बल शैम्पू पद्धति का खुलासा किया है।

बनावली के बर्तनों में मिले आंवला-शिकाकाई के अंश, पांच हजार वर्ष पुरानी ‘हर्बल शैम्पू’ पद्धति का संकेत।

बनावली के बर्तनों में मिले आंवला-शिकाकाई के अंश, पांच हजार वर्ष पुरानी ‘हर्बल शैम्पू’ पद्धति का संकेत।

HighLights

  1. बनावली में मिले बर्तनों में आंवला, शिकाकाई के अंश मिले।

  2. यह 5000 वर्ष पुरानी हर्बल शैम्पू पद्धति का संकेत है।

  3. राखीगढ़ी महोत्सव में इन प्राचीन उत्पादों के नमूने प्रदर्शित।

सुनील मान, नारनौंद। आज बोतलों में बंद शैम्पू और साबुन जिन प्राकृतिक तत्वों के गुण गिनाकर बाजार में बेचे जा रहे हैं, उनका ज्ञान सरस्वती-सिंधु सभ्यता के लोगों को हजारों वर्ष पहले भी था। हरियाणा के बनावली पुरास्थल से प्राप्त बर्तनों में आंवला और शिकाकाई जैसे प्राकृतिक तत्वों के अंश मिलने से उस दौर में बालों की सफाई एवं देखभाल के लिए हर्बल मिश्रण तैयार किए जाने के संकेत मिले हैं।

माना जा रहा है कि महिलाएं इन वनस्पतियों को मिलाकर पेस्ट तैयार करती थीं और उससे बाल धोने तथा संवारने का काम करती थीं। विभिन्न पुरास्थलों की खोदाई में मिली मिट्टी की महिला मूर्तियों पर उकेरे गए आकर्षक केश-विन्यास भी बताते हैं कि उस समय स्वच्छता के साथ सजने-संवरने की विकसित परंपरा थी। बनावली से मिले साक्ष्यों को आधार बनाकर अब शैम्पू और साबुन के नमूने तैयार किए गए हैं।

इन्हें राखीगढ़ी महोत्सव के एक स्टाल पर प्रदर्शित किया गया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी स्टाल पर रुककर इन उत्पादों और उनके पुरातात्विक आधार की जानकारी ली। यह प्रदर्शनी आगंतुकों को समझा रही है कि आधुनिक पैकिंग भले नई हो, लेकिन बालों की प्राकृतिक देखभाल की पद्धति की जड़ें हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता तक जाती हैं।

बर्तनों में सुरक्षित अंशों ने बताई प्राकृतिक मिश्रण की कहानी

बनावली में खोदाई के दौरान मिले कुछ बर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। इनमें आंवला और शिकाकाई जैसे प्राकृतिक तत्वों के अंश मिलने की बात सामने आई। पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि इनका उपयोग बालों की सफाई और देखभाल के लिए तैयार किए जाने वाले मिश्रण में होता रहा होगा।

आधुनिक शैम्पू की तरह यह किसी बोतल में बंद तैयार उत्पाद नहीं था, बल्कि वनस्पतियों को पीसकर बनाया जाने वाला प्राकृतिक पेस्ट रहा होगा। ये साक्ष्य बताते हैं कि सरस्वती-सिंधु सभ्यता के लोग पेड़-पौधों के गुणों से परिचित थे और दैनिक स्वच्छता में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का व्यवस्थित उपयोग करते थे।

मूर्तियों की केश-सज्जा में दिखा प्राचीन महिलाओं का सौंदर्यबोध

सरस्वती-सिंधु सभ्यता के विभिन्न पुरास्थलों से मिली महिला मृण्मूर्तियों में बालों को अनेक आकर्षक ढंग से संवारा हुआ दिखाया गया है। किसी मूर्ति में बालों का जूड़ा है तो किसी में सजावटी केश-विन्यास उकेरा गया है। इन कलाकृतियों से उस काल की महिलाओं की सौंदर्य चेतना और श्रृंगार के प्रति रुचि का पता चलता है।

विशेषज्ञ इन मूर्तियों को बनावली में मिले प्राकृतिक पदार्थों के साक्ष्यों से जोड़कर देखते हैं। इससे संकेत मिलता है कि बालों की सफाई करने के साथ उन्हें अलग-अलग शैलियों में सजाया भी जाता था। इस प्रकार प्राचीन कला स्वच्छता, शिल्प और जीवनशैली की कहानी एक साथ सामने लाती है।

बनावली में साबुन और शैम्पू जैसे प्राकृतिक मिश्रण से संबंधित अवशेष मिले थे। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर तैयार शैम्पू और साबुन राखीगढ़ी महोत्सव के स्टाल पर प्रदर्शित किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने भी स्टाल पर इनके संबंध में विस्तार से जानकारी ली। —नरेंद्र परमार, उपनिदेशक, हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग।