बहादुरगढ़, जेएनएन। एक वक्त वह भी था जब तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह पंजाब के किसानों के हाथों में ही था और टीकरी बॉर्डर के मंच पर हरियाणा के किसान नेता गुरनाम चढूनी को बोलने तक से रोक दिया था, लेकिन लाल किले की घटना के बाद से लगातार उतार पर चल रहे इस आंदोलन में किसानों की घटती संख्या के बीच अब गुरनाम चढूनी ने टीकरी बॉर्डर पर सक्रियता बढ़ा दी है।

जिस तरह से चार महीने के बाद चढूनी ने सोमवार को टीकरी बॉर्डर के मंच पर वापसी की ओर आंदोलन के बीच खुद के संगठन के तंबू का यूनियन के अस्थायी कार्यालय के रूप में उद्घाटन किया, उससे साफ है कि चढूनी अब यहां पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल, दिसंबर मध्य में टीकरी बॉर्डर पर ऐसी घटना हुई थी कि चढूनी ने टीकरी बॉर्डर के मंच से कन्नी काट ली थी या फिर यूं कहे कि यहां मंच पर पंजाब के किसानों ने जिस तरह से उनके साथ दुर्व्यवहार किया था, उसके बाद चढूनी इस मंच पर आने में संकोच करते रहे।

उसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने टीकरी बॉर्डर के अन्य प्वाइंट पर आवाजाही शुरू की। सबसे पहले सेक्टर-9 बाइपास पर चढूनी ने बैठक की। इसमें शामिल संगठनों ने गुरनाम चढूनी को हरियाणा के किसान संगठनों का नेता चुना, मगर इसके अगले ही दिन हरियाणा के 15 से अधिक अन्य किसान संगठनों ने चढूनी को हरियाणा के संगठनों का अध्यक्ष मानने से इंकार कर दिया था।

ऐसे में यहां पर बात नहीं बन सकी। मगर जब से आंदोलन में भीड़ घटी और दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च के समय हुए बवाल के बाद पंजाब के किसान बैकफुट पर आए, तब से गुरनाम चढूनी ने फिर टीकरी पर सक्रियता बढ़ानी शुरू की। कुछ दिन पहले भी दलाल खाप के भंडारे पर चढूनी ने आंदोलनकारियों के साथ बैठक की। उससे पहले महापंचायत में भी पहुंचे थे।

बताते हैं कि आंदोलन स्थल पर चढूनी की ओर से की गई एक बैठक में तो कुछ लोगों ने यह भी आवाज उठाई थी कि हरियाणा की ओर से आंदोलन स्थल पर दिया गया अधिकतर चंदा पंजाब के किसानों के पास चला गया। हालांकि इस बात को अधिक तूल इसलिए नहीं दिया गया कि कहीं आंदोलन को नुकसान न हो जाए।

सोमवार को तो गुरनाम चढूनी ने टीकरी बॉर्डर के नजदीक संयुक्त किसान मोर्चा भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के बैनर तले मेट्रो पिल्लर के साथ सड़क पर तैयार किए गए तंबू में अपने संगठन के अस्थायी कार्यालय का भी बाकायदा रीबन काटकर उद्घाटन किया।

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