जागरण संवाददाता, रोहतक। आमताैर पर कोई भी न्यायाधीश किसी आरोपित को सम्मान न देकर उनके साथ सख्ती से बातचीत करता है। लेकिन देश की आजादी के आंदोलन के समय एक घटना ऐसी भी हुई जब  न्यायाधीश ने एक आरोपित से कहा, आप बैठ जाइए। उस समय ये आरोपित कोई और नहीं बल्कि रोहतक के साधू महंत चंद्रनाथ योगी थे। जिन्होंने देश की आजादी के लिए आंदोलन में बढ़ चढ़कर भाग लिया। न्यायालय में आरोपित को सम्मान देते देख उस समय आसपास मौजूद कर्मचारी भी दंग रह गए।

नमक सत्याग्रह आंदोलन में लिया था भाग

महंत चंद्रनाथ योगी के पौत्र रोहतक निवासी सेवानिवृत लाइब्रेरियन रामरूप ने उस समय के महंत चंद्रनाथ योगी के लिखे लेख व पुस्तकें अब तक भी संभाल कर रखे हुए हैं। जिनमें इस तरह की घटनाओं का वर्णन है। उनके मुताबिक महंत चंद्रनाथ योगी ने आजादी के आंदोलनों में व्यक्तिगत रूप से भाग लेते हुए अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। 1930 में उन्होंने नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और अनेक लोगों में देशभक्ति की भावना पैदा की। जिसके चलते अंग्रेजों ने उन्हें सहारनपुर से गिरफ्तार कर लिया। उन्हें न्यायाधीश के समक्ष पेश किया गया। तो न्यायाधीश ने उनको बैठने के लिए कहा और उनसे उनके पक्ष में सफाई देने को कहा। इस पर चंद्रनाथ ने कहा कि उन्होंने अब तक कोई ऐसा कार्य नहीं किया है, जिससे उनके पूर्वजों या देश के सम्मान को ठेस पहुंचे। लेकिन अंग्रेजी शासन ने उनको सहारनपुर जेल भेज दिया।

जब वे जेल से बाहर आए तो 1931 में बोहर में जलसा किया और लोगों को आजादी के आंदेलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद उनको 1932 में अंग्रेज सरकार ने फिर एक साल के लिए जेल भेजे दिया। करीब पांच महीने रोहतक जेल में रहे, जिसके बाद उनको मुल्तान जेल भेज दिया गया। 1933 में उनकी सजा पूरी हुई। 1940 में सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने पर उनको फिर जेल भेजा गया और 50 रुपये जुर्माना भी किया गया। 1941 में उन्हें बरेली जेल भेजा गया। इसी साल एक अन्य मामले में उनको फिर से नाै महीने के लिए जेल हुई। 

कौन थे महंत चंद्रनाथ योगी

दरअसल, महंत चंद्रनाथ योगी मूल रूप से रोहतक के जसिया गांव के निवासी थे। उनका जन्म 1893 में हुआ। उनके पिता चौधरी रणजीत सिंह नंबरदार थे। जब उनकी आयु 15 साल थी तब वे 1908 में अस्थल बोहर मठ में आए और पूर्णनाथ योगी को गुरु बना लिया। गुरु पूर्णनाथ योगी ने उनके सहित यहीं पर सभी बच्चाें की शिक्षा के लिए एक अंग्रेज शिक्षक तैनात किया। यहां प्रारंभिक पढ़ाई के बाद चंद्रनाथ हरिद्वार स्थित संस्कृत पाठशाला में चले गए और वहां खूब अध्ययन किया। जिसके बाद 1924 में वे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के मुंडीखेड़ी गांव में जमीदारा करने लगे। देश अब जब आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है तो यह प्रसंग भी आजादी से ही जुड़ा होने के चलते इसकी महत कम नहीं है।

आजादी के आंदोलन में रही भूमिका

1942 में अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया तो फिर से उनको जेल भेज दिया गया। उनको नजर बंद भी किया गया। बाद में जब वे जेल से बाहर आए तो उन्होंने सहारनपुर से जिला परिषद का चुनाव लड़ा और वे सर्वसम्मति से विजयी हुई। उसके बाद तो आजादी के बाद भी यहां कई बार जिला परिषद का चुनाव जीता। इस तरह देश के आंदोलन और फिर जनता की सेवा करते हुए 1968 में उनका स्वर्गवास हो गया। रामरूप का कहना है कि आजादी के आंदोलन में इतना अधिक योगदान देने के बाद भी उनके दादा महंत चंद्रनाथ को वो सम्मान नहीं मिला है, जो उनको मिलना चाहिए था। 

Edited By: Rajesh Kumar