हिसार [वैभव शर्मा] महिलाओं को सवावलंबी बनाने के लिए जो ढाबा खोला गया और जहां किसी भी वक्‍त खाना मिलता था। अब वहां वहीं महिलाएं मजदूरी यानि दिहाड़ी पर काम कर रही हैं। देश की संसद में बैठने वाले सांसदों ने हिसार की विश्वास सेल्फ हेल्प ग्रुप की महिलाओं के हाथों से बने बाजरे के लड्डुओं की कभी तारीफ की थी। इन ग्रामीण महिलाओं की आवाज संसद तक लड्डुओं के माध्यम से पूर्व सांसद और वर्तमान में डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने पहुंचाई। महिलाएं इतनी प्रेरित हुईं कि रोजगार के लिए ढाबा तक खोलने की योजना तैयार कर ली। इस सपने को प्रशासन ने प्रशिक्षण और बस स्टैंड हिसार में कैंटीन मुहैया करा के पूरा कर दिया।

इन महिलाओं की अन्नपूर्णा कैंटीन को पूरे प्रदेश में एक मॉडल के रूप से लेना चाहिए था मगर इस सरकारी सिस्टम ने महिलाओं की कैंटीन बंद करा देने के साथ उनके सपने को भी चोट पहुंचाई। इस ग्रुप को संचालित करने वाली सुनीता देवी बताती हैं कि यहां से हर माह 27 से 30 हजार रुपये कमाने भी लगी थीं। मगर तीन महीने ढाबा चलाने के बाद अचानक से ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट ने इस कैंटीन की ओपन बोली का आर्डर निकाल दिया।

महिलाएं सरकारी दफ्तरों में भटकती रहीं, एडीसी ने ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट को पत्र भी लिखा। मगर राजस्व के सामने महिलाओं के सपने, अधिकारियों की अपेक्षाएं हार गईं और प्राइवेट वेंडर को करीब सवा लाख रुपये में कैंटीन दे दी गई। वहीं जब इस बारे में रोडवेज जीएम हिसार सुरेंद्र ङ्क्षसह से संपर्क साधा गया तो उनका मोबाइल नंबर स्विच ऑफ मिला। ये सभी महिलाएं नारनौंद के गांव भेड़ी अमीरपुर की हैं।

जानिये...कैसे, कब और क्यों सेल्फ हेल्प ग्रुप द्वारा संचालित अन्नपूर्णा ढाबे के प्रोजेक्ट को किया गया बंद

बस स्टैंड पर अन्नपूर्णा नाम से शुरू हुई थी कैंटीन

2019 की शुरुआत के बाद प्रशासन ने कई बड़े कार्यों को करने का प्रण लिया था। इसके बाद इसी साल ग्रामीण महिलाओं को एक होटेलियर के माध्यम से ट्रेङ्क्षनग दिलाई गई। इसमें खाना कैसे परोसना है, अपने आप को साफ कैसे रखना है, ड्रेस कैसी पहननी है, जैसे प्रशिक्षण शामिल थे। तब प्रशासन का मन था कि इन महिलाओं को बाहर से आर्डर मिलते रहेंगे नहीं तो प्रशासन के कार्यक्रम दे देंगे। काम अच्छा लगा तो प्रशासन ने बस स्टैंड पर अन्नपूर्णा नाम से इन्हें कैंटीन खुलवा दी। उस समय बस स्टैंड की कैंटीन खाली थी। महिलाओं ने 60 रुपये में हरियाणा के टेस्ट की थाली तैयार की। कैंटीन तीन महीने तक अच्छे से चली। सभी महिलाओं का खर्चा निकालकर कैंटीन से 30 हजार रुपये आय होने लगी।

ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के आदेश के बाद यहां भटकती रहीं महिलाएं

अन्नपूर्णा कैंटीन चलने के लगभग तीन महीने बाद ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट ने कैंटीन की ओपन बोली के लिए आदेश जारी कर दिए। विश्वास ग्रुप की यह महिलाएं प्रशासन के पास पहुंची। जहां एडीसी ने ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा कि सरकार की मंशा है कि सेल्फ हेल्प ग्रुप को बढ़ावा दिया जाए। इसी के तहत यह ढाबा खोला गया जोकि अच्छी आय कर रहा है। ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट की बोली अधिक महंगी है, इस कारण यह महिलाएं इस बोली में टिक नहीं सकती हैं। अगर यह मॉडल प्रदेशभर में लागू हुआ तो सेल्फ हेल्प ग्रुप के लिए बड़ी सफलता होगी। यह पत्र ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के अलावा दूसरे उच्चाधिकारियों को भी भेजे गए। बहरहाल ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट ने बात नहीं मानी और ओपन बोली में एक प्राइवेट ठेकेदार को कैंटीन दे दी।

अब 5 हजार रुपये महीने पर कर रहीं दिहाड़ी

प्राइवेट हाथों में कैंटीन जाने के बाद कैंटीन संचालक ने इनमें से कुछ महिलाओं को करीब पांच से छह हजार रुपये महीने की दिहाड़ी पर रख लिया। तो कुछ महिलाएं यहां फिर दोबारा से काम नहीं कर पाईं। अब यह महिलाएं बाहर से मिलने वाले कार्यों पर ही आश्रित हैं।

सेल्फ हेल्प ग्रुप के लिए सबसे बड़ी समस्या

काम करने के लिए जगह न मिलना

- बस स्टैंड कैंटीन ही नहीं सरकार की पॉलिसी ऐसी है कि महिलाओं को लघु सचिवालय की कैंटीन में भी जगह नहीं मिल पाई। यहां भी प्राइवेट ठेकेदार ने ही ओपन बोली में कैंटीन ले ली।

- नगर निगम से भी प्रशासन ने इन महिलाओं को स्थापित करने के लिए जगह मांगी मगर वह भी काम नहीं हुआ। कोशिश थी कि शहर में बीटा बूथ की तरह ही बूथ मिल जाए जहां बिक्री हो सके। मगर यह प्रोजेक्ट भी धराशाई हो गया।

- महिलाओं द्वारा एचएयू कैंपस में भी जगह की कोशिश की गई मगर यह बात भी नहीं बनी। हैरानी की बात है कि शहर में किसी भी स्थान पर इन महिलाओं को रोजगार चलाने के लिए उपयुक्त जगह ही नहीं है।

यह उठाने चाहिए थे कदम

- सरकार के संज्ञान में लगाकर इस मामले को ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट की मदद से कोई बीच का रास्ता निकालना चाहिए था।

- अगर ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट राजी नहीं था तो महिलाओं को किसी दूसरे स्थान पर भी जगह दिला सकते थे।

- व्यक्तिगत तौर पर संज्ञान लेते तो अन्नपूर्णा कैंटीन नहीं बंद होती।

 

-----सरकार चाहती है कि सेल्फ हेल्प ग्रुप को लगातार बढ़ावा दिया जाए। ग्रामीण महिलाओं की यह कैंटीन अच्छा प्रयास था। इसके लिए हमने शासन में भी लिखा। इन ग्रुप्स की महिलाओं को सरकारी कैंटीनों में कुछ छूट मिलनी चाहिए, अभी शायद कुछ नियम बदले हैं, यह चेक करना पड़ेगा।

--अशोक कुमार मीणा, उपायुक्त।

Posted By: Manoj Kumar

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस