हिसार [राजेश स्वामी] जिले की अदालत ने ऑनर किलिंग मामले में जुगलान के अशोक को फांसी की सजा सुनाने से पहले कई मामलों में दोषियों को यह सजा दे चुकी है। करीब तीन दशक में 12 अलग-अलग मुकदमों में 18 से ज्यादा लोगों को फांसी की सजा सुना चुकी है। दो महिलाओं सहित 18 से ज्यादा दोषियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। इनमें सबसे बहुचर्चित पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया परिवार हत्याकांड रहा था। रेलूराम की बेटी सोनिया और दामाद संजीव को यहां की अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। जो बाद में उम्रकैद में तबदील हो गई। इसके अलावा दो भाइयों को कहीं से राहत नहीं मिली थी। इसके अलावा कुछ मामलों में सजा उम्रकैद में बदल गई और कुछ मामलों के आरोपित बरी हो गए। 

शक्करपुर गांव में हुई दो हत्या के मामले में 1988 में हुई सजा
रिकॉर्ड के अनुसार साल 1978 में जाखल के शक्करपुर गांव में हुई दो हत्याओं के मामले में जिला अदालत ने 1988 को दो भाइयों अमरीक और जीत सिंह को फांसी की सजा सुनाई थी। वह सजा सुप्रीम कोर्ट और आगे तक बरकरार रही थी। यहां सेंट्रल जेल में दोनों को फांसी पर लटकाया गया था। दोनों ने जमीनी विवाद में अपने भाई और बहनोई की हत्या की थी। जिसमें इनके माता-पिता सहित तीन लोग घायल हुए थे। इस मामले में मां-बाप ने चश्मदीद गवाह के रूप में अपने बेटों के खिलाफ गवाही दी थी। जब सुप्रीम कोर्ट से मामला निकल गया था। तब दोनों ने शपथ-पत्र देकर अपने बयानों को झूठा बताया था, लेकिन कोई राहत नहीं मिली थी।

घिराय में सरपंच की पत्नी को 1984 में मिली सजा, हाई कोर्ट ने उम्रकैद में बदला
इसके अलावा निकटवर्ती घिराय गांव के तत्कालीन सरपंच रणधीर सिंह की पत्नी को 1984 में फांसी की सजा सुनाई गई। बाद में हाईकोर्ट ने महिला को राहत देकर सजा को उम्रकैद में बदल दिया था। महिला ने अपने बच्चों के साथ मिलकर सरपंच की दूसरी पत्नी और बच्चों की हत्या की थी।

1994 में घिराय में तिहरे हत्याकांड में चार को सजा, सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी
इसी तरह 1994 में अदालत ने घिराय निवासी हरस्वरूप सहित चार दोषियों को तिहरे हत्याकांड में फांसी की सजा सुनाई थी। वे बाद में सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए थे। हरस्वरूप और उसके साथियों पर अपनी दो बहनों व बरवाला के एक अध्यापक की हत्या करने का आरोप था।

गोरखपुर में दोहरे हत्याकांड में एक को फांसी, हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदला
गोरखपुर में हुए एक दोहरे हत्याकांड में 2000 में अदालत ने कृष्ण को फांसी और एक दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। जबकि एक आरोपित को बरी कर दिया था। बाद में कृष्ण की फांसी को हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया था। तीनों पर एक मामले के दो गवाहों की हत्या करने का आरोप था।

2000 में तलवंडी राणा दो को फांसी, सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदला
इसी प्रकार साल 2000 में अदालत ने पांच कत्ल के मामले में तलवंडी राणा गांव निवासी रामकिशन और मुन्ना को फांसी की सजा सुनाई थी। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कनफर्म करने के बाद रिव्यू के दौरान उम्रकैद में बदल दिया था। रामकिशन ने कुआं खोदने के एक विवाद में अपने खेत के पड़ोसी परिवार के पांच सदस्यों की मुन्ना के साथ मिलकर हत्या कर दी थी।

मय्यड़ में तिहरे हत्याकांड में तीन को सजा ए मौत
जमीनी विवाद के कारण मय्यड़ गांव में हुए तिहरे हत्याकांड में अदालत ने धर्मवीर और दो अन्य को फांसी की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने एक को बरी कर दिया था। जबकि एक पैरोल के दौरान एनकाउंटर में मारा गया था और धर्मवीर की सजा उम्रकैद में बदल दी गई थी।

ढंढूर एरिया के मर्डर मामले में फांसी, हाईकोर्ट से राहत
इसके अलावा अदालत ने ढंढूर एरिया के मर्डर मामले में फांसी की सजा सुनाई थी। दोषियों को हाईकोर्ट से राहत मिल गई थी।

यह था बहुचर्चित रेलूराम हत्याकांड
लितानी मोड़ स्थित कोठी में 23 अगस्त 2001 की रात खून की होली खेली गई थी। पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया, पत्नी कृष्णा, बेटी प्रियंका, बेटे सुनील, पुत्रवधू शकुंतला, पौत्री शिवानी व प्रीति और पौत्र लोकेश की संपति के विवाद को लेकर लोहे की रॉड से हमला कर हत्या कर दी गई थी। रेलूराम की बड़ी बेटी सोनिया और दामाद संजीव ने साजिश के तहत परिवार के सभी सदस्यों को मार डाला था। यहां की अदालत ने सोनिया और संजीव को 31 मई 2005 को फांसी की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय का फैसला पलटकर फांसी की सजा को उम्रकैद की सजा में बदल दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उम्रकैद के फैसले को पलटते हुए सत्र न्यायालय के फांसी के फैसले पर मुहर लगाई थी। राष्ट्रपति ने प्राण रक्षा की याचिका खारिज कर दी थी, जिस पर दोनों पर सूली चढऩे की तलवार लटक गई थी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के फैसले को देरी से याचिका डिसमिस करने की बात कहते हुए दोनों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था।

Posted By: manoj kumar

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