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पांच नहीं, आठ हजार वर्ष पुरानी सभ्यता के दावे पर छिड़ेगी बहस, हड़प्पा सभ्यता का नाम सरस्वती सिंधु सभ्यता करने की मांग

Published: Sat, 17 Oct 2026 10:39 PM (IST)

पुरातत्वविद प्रोफेसर वसंत शिंदे का दावा है कि हड़प्पा सभ्यता 8000 साल पुरानी है और इसे 'सरस्वती-सिंधु सभ्यता' कहा जाना ...और पढ़ें

डेक्कन कालेज डीम्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति एवं पुरातत्वविद प्रोफेसर वसंत शिंदे। फोटो जागरण

डेक्कन कालेज डीम्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति एवं पुरातत्वविद प्रोफेसर वसंत शिंदे। फोटो जागरण

HighLights

  1. सभ्यता की आयु 5000 नहीं, 8000 वर्ष पुरानी।

  2. सभ्यता को 'सरस्वती-सिंधु सभ्यता' कहने पर जोर।

  3. पुरातत्वविद प्रोफेसर वसंत शिंदे ने किया बड़ा दावा।

सुनील मान, नारनौंद (हिसार)। राखीगढ़ी महोत्सव के दौरान आयोजित होने वाले राष्ट्रीय सम्मेलन में सभ्यता की प्राचीनता और उसके नाम को लेकर बड़ी अकादमिक बहस छिड़ सकती है। डेक्कन कालेज डीम्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति एवं पुरातत्वविद प्रोफेसर वसंत शिंदे का दावा है कि सामान्यतः करीब पांच हजार वर्ष पुरानी कही जाने वाली इस सभ्यता की जड़ें लगभग आठ हजार वर्ष पहले तक पहुंचती हैं।

उनका यह भी मत है कि इसे केवल हड़प्पा सभ्यता कहने के बजाय ‘सरस्वती-सिंधु सभ्यता’ नाम दिया जाना चाहिए। इस तर्क के पीछे प्राचीन बस्तियों का भौगोलिक विस्तार बताया जा रहा है। राखीगढ़ी, बनावली, कुणाल, फरमाना, कालीबंगा और भिरड़ाना जैसे प्रमुख स्थल घग्गर-हकरा अथवा वैदिक सरस्वती से जोड़े जाने वाले क्षेत्र में हैं। वहीं हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और लखीन जोदड़ो सिंधु नदी क्षेत्र में स्थित हैं।

शिंदे के अनुसार सभ्यता के अधिकतर नगर सरस्वती क्षेत्र और शेष सिंधु क्षेत्र में बसे थे, इसलिए दोनों नदियों को समेटने वाला नाम इसके विस्तार को बेहतर ढंग से व्यक्त करता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों में घग्गर बेसिन के स्थलों सहित हड़प्पा सभ्यता के आरंभ को करीब 5500 ईसा पूर्व तक पीछे ले जाने की बात सामने आई है। हालांकि राखीगढ़ी के प्रत्यक्ष काल निर्धारण और पूरी सभ्यता की अवधि को लेकर विशेषज्ञों के बीच अध्ययन व विमर्श जारी है।

नाम बदलने के पक्ष में हैं प्रोफेसर वसंत शिंदे

प्रोफेसर वसंत शिंदे ने बताया कि उन्होंने राखीगढ़ी सहित इस सभ्यता से जुड़े अलग-अलग स्थलों पर खोदाई और अध्ययन किया है। उनके अनुसार अधिकतर प्राचीन नगर सरस्वती नदी से जुड़े क्षेत्र में और कुछ नगर सिंधु नदी के किनारे विकसित हुए।

ऐसे में सभ्यता को केवल हड़प्पा के नाम से पहचानना इसके पूरे भौगोलिक विस्तार को प्रदर्शित नहीं करता। राष्ट्रीय सम्मेलन में इस विषय पर पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के बीच चर्चा की जाएगी। शिंदे ने स्पष्ट किया कि वह इसका नाम ‘सरस्वती-सिंधु सभ्यता’ रखने के पक्ष में हैं।

कार्बन-14 से ऐसे लगाया जाता है अवशेषों की आयु का अनुमान

कार्बन-14 एक रेडियोधर्मी तत्व है, जिसे जीवित पेड़-पौधे वातावरण से ग्रहण करते हैं। उनके नष्ट होने के बाद कार्बन-14 की मात्रा धीरे-धीरे घटती है। इसकी शेष मात्रा मापकर वैज्ञानिक नमूने की आयु का अनुमान लगाते हैं। कार्बन-14 की मात्रा आधी होने में करीब 5,730 वर्ष लगते हैं।

राखीगढ़ी के चारकोल नमूनों की जांच एक्सेलेरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक से इंटर यूनिवर्सिटी एक्सीलरेटर सेंटर, दिल्ली में की गई थी। इस अध्ययन का प्रकाशन वर्ष 2016 में ‘करंट साइंस’ में हुआ था।