बहादुरगढ़, जेएनएन। ज्यों-ज्यों वक्त बीत रहा है त्यों-त्यों तीन कृषि कानूनों के विरोध में टीकरी बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन की तस्वीर भी बदलती जा रही है। आंदोलन की शुरूआत से कदम कदम पर जो लंगर जारी थे, वहां पर चूल्हे अब बंद हो गए। ऐसे में भीड़ भी छंट गई। अब आंदोलन के बीच सन्नाटा सा है। टीकरी बॉर्डर पर सभा भी चलती है और उसमें आंदोलनकारी शामिल भी होते हैं, मगर 15 किलोमीटर तक फैले इस आंदोलन में अब वो बात नहीं।

मददगार भी अब बेहद ही कम हैं। दूध की सप्लाई का दिन भर इंतजार रहता है। राशन और सब्जी का संकट भी बनता जा रहा है। पहले कई जगह माॅल खोले गए थे। वहां से किसान फ्री सामान ले रहे थे। मगर अब खालसा एड को छोड़कर बाकी मॉल दिखाई नहीं दे रहे हैं। लंगर व्यवस्था भी गिनी-चुनी जगह ही मिलते हैं।

पकवान भूल गए हैं आंदोलनकारी

सर्दी में आंदोलन के बीच खूब पकवान बन रहे थे। कभी गाजरपाक, कहीं गुलाब जामुन, कहीं जलेबी, कहीं हलवा, कहीं खीर तो कहीं हरी जलेबी और पंजाब से लाई जाने वाली पिन्नी अब दिखाई नहीं देती। हालांकि मौसम के साथ कुछ चीजों में बदलाव तो स्वाभाविक है, मगर पुराने की जगह नए पकवान नहीं ले पाए। पहले की तरह यहां पर पकवान नहीं बन रहे हैं। अब हालात यह है कि पीने के पानी का प्रबंधन करने में भी पसीना छूटता है। कई जगह आरओ प्लांट लगे हैं, लेकिन किसानों के चेहरे पर पहले जैसी रौनक कहीं नहीं दिखती। मेडिकल कैंप भी कम हो गए हैं। लाइब्रेरी भी खत्म हो गई हैं।

अधिकांश ट्रैक्टर-ट्राली वापस लौट गए हैं। मोर्चा के आह्वान पर पहले होने वाले कार्यक्रमों में जहां हरियाणा के किसानों की संख्या ज्यादा होती थी, वहां पर पंजाब के किसान खुद मोर्चा संभालने पर मजबूर हैं। हालांकि इन सबके बावजूद किसान नेताओं का दावा है कि अभी तो खेतों में कार्य चल रहा है, इसलिए वह कार्य भी निपटाना है। जब बॉर्डरों पर जरूरत होगी, तो भीड़ पहले से भी ज्यादा होगी। पंजाब व हरियाणा से ट्रैक्टर-ट्राली भी पहुंच जाएंगे। आंदोलन जारी रहेगा।

 

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