भिवानी [सुरेश मेहरा] सेना के जाबांजों ने हमेशा ही भारत मां की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगाई है। ऐसे ही जांबाज थे बापोड़ा निवासी वीर चक्र प्राप्त जांबाज मथान सिंह। उन्होंने वर्ष 1965 की लड़ाई में पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया था और मोर्चे पर भारतीय सेना ने कब्जा कर लिया था। इस बहादुरी के लिए मरणोपरांत 26 जनवरी 1966 में उनको वीर चक्र से नवाजा गया था। ऐसे बहादुरों पर हमें गर्व है।

बापोड़ा निवासी मथान सिंह का जन्म 16 जून 1943 को हुआ। वह 19 साल की उम्र में 16 जून 1962 को 2 राजपूताना राइफल रेजीमेंट में भर्ती हुए। वह पराक्रम के धनी रहे। 6 सितंबर 1965 को भारत पाकिस्तान युद्ध में इस योद्धा ने जबरदस्त पराक्रम दिखाया और उनकी इस उपलब्धि पर 26 जनवरी 1966 को उनको वीर चक्र की उपाधि से सम्मानित किया गया। उनके पिता श्रीचंद और मां सूरजबाई से उनको पराक्रम की सीख दी।

जान की बाजी लगा कर दुश्मन को मोर्चे से खदेड़ दिया था

रविंद्र परमार बताते हैं कि उनके ताऊ मथान सिंह इतिहास के पन्नों में अपनी बहादुरी का पैगाम दर्ज कर गए। बात 6 सितंबर 1965 की है। भारत पाक युद्ध छिड़ चुका था। वीर जांबाज मथान सिंह और उनकी बटालियन को पंजाब स्थित डेरा बाबा नानक के नजदीक रावी नदी पर बैठे दुश्मन को खत्म करने का हुकम मिला। इस बीच दुश्मन ने मथान सिंह के मोर्चे पर जबरदस्त पर हमला बोल दिया। दोनों तरफ से जबरदस्त फायरिंग हुई। दुश्मन की मशीन के ब्रस्ट से मथान सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए।

इसकी परवाह किए बिना मथान सिंह ने दुश्मन पर ताबड़तोड़ हमला जारी रखा। जिसके चलते दुश्मन की सेना भाग खड़ी हुई। दुश्मन के मोर्चे पर भारतीय सेना कब्जा करने के लिए पहुंची और अपने वीर जांबाज को संभाला तो उस समय वह शहादत को प्राप्त हो चुके थे। लेकिन मरते दम तक उन्होंने दुश्मन से लोहा लिया और उनको वहां से भागने के लिए मजबूर कर दिया। इस हमले में उन्होंने दुश्मन देश के कई सैनिकों को मौत की नींद सुला दिया।

शहीद हो चुके थे फिर भी हाथ मशीनगन के ट्रेगर पर था

वह बताते हैं उनके ताऊ मथान सिंह की बहादुरी के चर्चे आज भी ताजा है। बताया गया कि मथान सिंह दुश्मन के हमले से शहीद हो चुके थे लेकिन इससे पहले उन्होंने दुश्मन को मार भगाया था। खास बात यह रही कि जब भारतीय सेना के जांबाज दुश्मन के मोर्चे पर कब्जा करने पहुंचे ओर अपने साथी को संभाला तो हैरान कर देने वाला दृश्य था। जांबाज मथान सिंह शहीद हो चुके थे पर वे ऐसे खड़े थे जैसे दुश्मन का डटकर अब भी सामने करने को तैयार हों। उनकी मशीनगन कंधे से सटी थी ओर हाथ उसके ट्रिगर पर था। उनकी बहादुरी के चर्चे आज भी क्षेत्र में हैं।

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