भीख मांगने और कूड़ा बीनने वाले के हाथों में थमाई कलम, हरियाणा की अनु चिनिया ने 20 हजार बच्चों को दी नई जिंदगी
हिसार की अनु चिनिया पिछले 13 वर्षों से जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा से जोड़ रही हैं।

हिसार की अनु चिनिया (फाइल फोटो)
HighLights
अनु चिनिया ने 13 वर्षों से बच्चों को शिक्षा दी
20 हजार बच्चों को 'भीख नहीं, किताब दो' से शिक्षा
40 महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई से आत्मनिर्भर बनाया
नमहा यादव, हिसार। किसी बच्चे के हाथ से भीख मांगने का कटोरा छीनकर उसमें कलम थमा देना केवल उसकी जिंदगी बदलना नहीं, बल्कि उसके भविष्य को नई दिशा देना है। हिसार की अनु चिनिया पिछले 13 वर्षों से इसी सोच के साथ जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा से जोड़ने में जुटी हैं।
बस स्टैंड पर भीख मांगते बच्चों को देखकर उनके मन में उठी एक छोटी-सी चिंता आज ‘भीख नहीं, किताब दो’ मुहिम का रूप ले चुकी है।
20 हजार बच्चों को दिखाया शिक्षा का रास्ता
इस अभियान के तहत 20 हजार बच्चों तक पहुंचकर उन्हें शिक्षा और सम्मान का रास्ता दिखाया गया है। अब अनु उन महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने में जुटी हैं, जो कभी मजबूरी में कूड़ा बीनने या भीख मांगने का काम करती थीं।
अनु के लिए यह पहल केवल बच्चों को स्कूल भेजने या महिलाओं को हुनर सिखाने तक सीमित नहीं है। उनका उद्देश्य ऐसे लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है।
उनका मानना है कि किसी कूड़ा बीनने या भीख मांगने वाले बच्चे को मानसिक रूप से तैयार कर सामान्य जीवन और शिक्षा की राह पर लाने में तीन से चार वर्ष तक लग सकते हैं। अनु चिनिया जब कॉलेज में पढ़ाई करने जाती थीं, तब हिसार बस स्टैंड पर अक्सर बच्चों को भीख मांगते देखती थीं।
शुरुआत में उन्होंने बच्चों से बातचीत की। वह अपने भाई के साथ सुबह बच्चों की झोपड़ी में पहुंचीं। वहां पता चला कि परिवार की आजीविका भीख मांगने पर निर्भर थी और बच्चों के पिता की तबीयत भी खराब थी। ऐसे में बच्चों को स्कूल भेजने की बात करना आसान नहीं था।
अब मेहनत से बना रहे पहचान
अनु बताती हैं कि बच्चे लकड़ी, शीशे और गाड़ियों से जुड़े काम सीखकर रोजगार हासिल कर रहे हैं। संस्था से जुड़े कुछ बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में भी भेजा गया है।
इसी बदलाव की एक प्रेरक मिसाल वह बच्चा है, जो कभी भीख मांगता था और आज हरियाणा की स्टेट वालीबाल टीम में खेल रहा है। ऐसे बच्चों की उपलब्धियां अनु के प्रयासों को नई ऊर्जा देती हैं।
सात महिलाओं से शुरू हुई पहल 40 महिलाएं बनी आत्मनिर्भर दो वर्ष पहले उन्होंने महिलाओं के प्रति समाज का व्यवहार देखा तो महसूस किया कि उन्हें केवल नौकरी दिलाना ही पर्याप्त नहीं है।
उन्हें ऐसा हुनर देना जरूरी है, जिससे वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। उन्होंने सात महिलाओं की काउंसलिंग कर उन्हें सिलाई और कढ़ाई का प्रशिक्षण देना शुरू किया। धीरे-धीरे इस पहल से जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या 40 हो गई।
