रिंग नहीं मिला तो कोच ने रेत के टिलों पर दौड़ाया, कबड्डी पर 'अंकुश' लगा बने बॉक्सिंग चैंपियन; हिसार के लाल की प्रेरक कहानी
हिसार के अंकुश पंघाल ने एशियाई खेलों में 80 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीता, जिसकी शुरुआत उन्होंने कबड्डी से ...और पढ़ें

एशियाई खेलों नें गोल्ड मेडल जीतने पर खुशी मनाते अंकुश के माता-पिता। फोटो जागरण
HighLights
अंकुश पंघाल ने एशियाई खेलों में 80 किग्रा मुक्केबाजी में स्वर्ण जीता।
कबड्डी खिलाड़ी से मुक्केबाज बने, रेत के टीलों पर किया कठिन अभ्यास।
कठोर अनुशासन और परिवार के खेल संस्कार ने दिलाई यह सफलता।
सुभाष चंद्र, हिसार। भेरिया गांव की मिट्टी से निकले अंकुश पंघाल की एशियाड स्वर्ण तक पहुंचने की कहानी मुक्केबाजी के रिंग से नहीं, कबड्डी के मैदान से शुरू हुई थी। पांचवीं कक्षा में राज्य स्तरीय स्कूली कबड्डी प्रतियोगिता का स्वर्ण जीतने वाले अंकुश को करीब 11-12 वर्ष की उम्र में पिता सुरेश पंघाल ने मुक्केबाजी की ओर मोड़ा।
इसके बाद कोच राजेश से शुरुआती प्रशिक्षण मिला और प्रदीप सावंत के मार्गदर्शन में उनकी मुक्केबाजी को धार मिली। शुक्रवार को आइची-नागोया एशियाई खेलों के 80 किग्रा वर्ग के फाइनल में दक्षिण कोरिया के किम मिनसियोंग को 4-0 से हराकर अंकुश ने स्वर्ण जीता। इससे पहले क्वार्टर फाइनल में ताजिकिस्तान के नेक्रूज सलीमोव को 5-0 और सेमीफाइनल में मौजूदा विश्व चैंपियन उज्बेकिस्तान के फजलिद्दीन एरकिनबोएव को 4-1 से हराया था।
रिंग नहीं था, रेत के टीलों पर कराया अभ्यास
अंकुश के शुरुआती प्रशिक्षण में आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं। गंगवा के सरकारी स्कूल के खुले मैदान में अभ्यास होता था और मुक्केबाजी के लिए रिंग तक उपलब्ध नहीं था। कोच प्रदीप सावंत ने खिलाड़ियों का दमखम बढ़ाने के लिए आसपास के रेत के टीलों पर दौड़ लगवाई। दूसरे खिलाड़ी थकान जताते तो अंकुश खामोशी से अभ्यास पूरा करते।
यही अनुशासन आगे चलकर उनकी खेल शैली का हिस्सा बना। 14 वर्ष की उम्र में स्कूली राष्ट्रीय प्रतियोगिता का स्वर्ण जीतकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया और खेलो इंडिया के तहत मासिक छात्रवृत्ति भी हासिल की।
घर में ही मिला खेल का संस्कार
अंकुश के पिता सुरेश पंघाल राष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी रहे हैं और भेरिया में होटल चलाते हैं। मां मुकेश देवी गृहिणी हैं। तीन बड़ी बहनों में नीलम निशानेबाजी प्रशिक्षक हैं, जबकि अंजू बाला और नीतू रानी मुक्केबाज हैं। नीतू रेलवे में कार्यरत हैं। वर्ष 2024 में अंकुश सेना में हवलदार बने। परिवार में खेल के इसी माहौल ने उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
चोट के बावजूद रजत, फिर लगातार स्वर्ण
2023 में कजाकिस्तान युवा प्रतियोगिता में रजत और 2025 विश्व मुक्केबाजी कप में चोट के बावजूद रजत जीतने के बाद अंकुश ने 2026 में उस्ती नाद लाबेम ग्रां प्री प्रतियोगिता में स्वर्ण हासिल किया। इसके बाद ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में 80 किग्रा वर्ग का स्वर्ण जीता। अब एशियाड में भी स्वर्ण जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों में एक और बड़ा अध्याय जोड़ दिया।
चूरमा-मालपुआ पसंद, मगर अनुशासन पहले
अंकुश को घर का देसी घी का चूरमा और मालपुआ पसंद है, लेकिन खिलाड़ी की दिनचर्या में इनसे दूरी रहती है। बड़े मुकाबलों के बाद परिवार के साथ इनका स्वाद लेने का मौका मिलता है। अब एशियाड स्वर्ण के बाद भेरिया में जश्न है-उस खिलाड़ी के लिए, जिसने कबड्डी से शुरुआत की और रेत के टीलों की दौड़ से दमखम गढ़कर एशियाड की स्वर्णिम मंजिल हासिल की।
