प्रियंका दुबे मेहता, गुरुग्राम

वाराणसी के मंदिरों पर आक्रांताओं की कुदृष्टि सदा से रही। इसके प्रमाण इतिहास के पन्नों में मिलते हैं। गुरुग्राम के सेक्टर-32 स्थित अमेरिकन इंस्टीट्यूट आफ इंडियन स्टडीज के कला एवं पुरातत्व विभाग के संग्रहालय और पुस्तकालय में ऐसे ही कई साक्ष्य मौजूद हैं, जो किताबों और दस्तावेजों के रूप में मिलते हैं। वर्चस्व और साम‌र्थ्य प्रदर्शन के लिए मुगल धार्मिक स्थलों को निशाना बनाते थे। औरंगजेब से पहले के शासकों ने भी मंदिरों को ध्वस्त करके मस्जिद और मकबरे बनवाए। बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में भी विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग पर रजिया सुल्तान ने नजर डाली। कई ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह भी पता चलता है कि केवल वाराणसी ही नहीं, पूरे देश में मंदिर के तौर पर ही इसकी महत्ता थी। लोग देश भर से यहां आते थे और उसके लिए बाकायदा लगाया गया कर चुकाने के भी प्रमाण हैं।

एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल के जर्नल के 31वें संस्करण के पृष्ठ संख्या 123 पर लिखा है, इस बात के प्रमाण हैं कि गहड़वाली वंश के राजा गोविद चंद्र (शासनकाल 1114 से 1154) यहां पूजा किया करते थे और उसका उल्लेख करता हुआ ताम्रपत्र आज भी विद्यमान है। इसका सीधा मतलब है कि यह मंदिर था। इतना ही नहीं मुगलों ने जजिया यानी की तीर्थस्थलों की यात्रा और पूजा-अर्चना पर लगने वाला कर लगाया था। उसके उल्लेख से इतिहास भरा हुआ है। ज्ञानवापी मंदिर नहीं था तो यहां की यात्रा और दर्शनों पर जजिया क्यों लगाया जाता? 'काशी का इतिहास' पुस्तक में डा. मोतीचंद्र ने जजिया के संबंध में लिखा है कि जब वाराणसी यात्रा के लिए जजिया लगया गया तो कर्नाटक के होयसला साम्राज्य के राजा नरसिंहा (तृतीय) ने 1279 ईस्वी में 645 निष्क (सोने की मोहर) का राजस्व देने वाला एक गांव दान दे दिया था और उसके एवज में कर्नाटक और तेलंगाना सहित अन्य कई प्रदेशों के श्रद्धालुओं को विश्वेश्वर मंदिर जाने की इजाजत मिली थी। इसका प्रमाण ताम्रपत्र ग्रांट नंबर 298 के रूप में एपीग्राफिया कर्नाटका के 15वें संस्करण के पृष्ठ संख्या 71 से 73 में मिलता है।

इसी समय का एक और साक्ष्य गुजरात से वाराणसी की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को लेकर मिलता है। तेरहवीं शताब्दी में वहां से भी कर दिया जाता था और वहां से लोग विश्वेश्वर मंदिर में दर्शन करने आते थे। डा. मोती चंद्रा की पुस्तक 'काशी का इतिहास' में एक उदाहरण मिलता है, जो लगभग इसी काल का है। डा. मोती चंद्रा ने लिखा है कि उस समय गुजरात के एक जैन सेठ वास्तुपाल ने विश्वेश्वर मंदिर में पूजा करने की अनुमति प्राप्त करने के लिए एक लाख रुपये दिए थे।

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विश्वेश्वर मंदिर की जगह बना मकबरा

तेरहवीं शताब्दी के आसपास एक बार फिर से मंदिरों के निर्माण और मरम्मत के प्रयास शुरू हुए। कुबेर नाथ सुकुल ने अपनी पुस्तक 'वाराणसी डाउन द एजेज' में लिखा है कि 1194 में बनारस के सभी मंदिर ध्वस्त कर दिए गए थे और वे इसी अवस्था में कई दशकों तक रहे। यह स्थान उस समय सख्त मुगल अधिकारियों के नियंत्रण में था। 1236 ई. और 1240 ई. के बीच विश्वेश्वर मंदिर के मूल स्थान पर रजिया मस्जिद बना दी गई। धीरे-धीरे जब यहां के अधिकारियों के तेवर कुछ नर्म पड़ने लगे तो फिर से मंदिरों के निर्माण का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन विश्वेश्वर मंदिर के मूल स्थान पर तो मस्जिद थी। जाहिर सी बात है, मस्जिद को हटाना तो संभव नहीं था। ऐसे में विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग को उसके मूल स्थान के बजाय अविमुक्तेश्वर परिसर में पुनस्र्थापित किया गया।

Edited By: Jagran