प्रियंका दुबे मेहता, गुरुग्राम

गुरुग्राम साइबर सिटी और मिलेनियम सिटी बना तो साथ ही इसने परंपराओं का पोषण भी बखूबी किया। आधुनिकता का चमकीला चोला ओढ़ा लेकिन अपनी मौलिकता की चादर नहीं छोड़ी। अंग्रेजी परिवेश का बाहें फैलाकर आत्मसात किया लेकिन हिदी साहित्य का तिरस्कार नहीं किया। हां, उस स्तर पर हिदी साहित्य को लेकर रुचि नहीं जाग पाई लेकिन गुरु द्रोण की इस नगरी में साहित्य संवर्धन होता रहा है। कम संख्या में ही सही, आगे आए नवोदित साहित्यकार पुराने वट वृक्षों की छांव में फलते फूलते रहे। साहित्यिक गोष्ठियां होने लगीं, लोगों को मंच मिलने लगा और लेखकों ने अपनी कलम से समाज की कुरीतियों, बदलाव की आवश्यकताओं के साथ नारी मन की व्यथा और सामाजिक विसंगतियों को शब्दों के जामे में लोगों के सामने प्रस्तुत करना शुरू किया तो वैचारिक बदलाव की एक नई बयार चली और शहर में साहित्य संवर्धन की परंपरा स्थापित हुई। हालांकि साहित्यकार और साहित्यप्रेमी शहर में साहित्य की स्थिति को लेकर संतुष्ट नहीं हैं लेकिन फिर भी आशान्वित हैं कि आने वाले समय में साहित्य के मोती समाज के हर वर्ग में बिखरेंगे।

'हमकलम' के धागे में पिरोए साहित्य के मोती

एक वक्त था जब शहर अपने नए वजूद के निर्माण में जुटा हुआ था। गांव से अत्याधुनिक हाइटेक शहर में तब्दील होने के लिए जितने भी प्रयास होने चाहिए थे, सब चल रहे थे। इस नवनिर्माण में साहित्य कहीं हाशिए पर सरकता नजर आ रहा था। कुछ लोग साहित्य और साहित्यकारों की नैया डूबने से बचाने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे लेकिन उनके वह प्रयास भी नाकाफी साबित हुए। शहर मिलेनियम सिटी के तौर पर स्थापित हो गया तो साहित्यप्रेमी वर्ग ने पठन-पाठन और साहित्य चर्चा का एक नया दौर शुरू किया। उन्हीं चंद साहित्यकारों में से एक मिरांडा हाउस कालेज की हिदी की प्राध्यापक और विभिन्न पत्रिकाओं की संपादक डा. संतोष गोयल थी। कनाडा से गुरुग्राम आई संतोष ने देखा कि यहां एक भी संस्था नहीं थी। उन्होंने 15 जुलाई 2007 को हमकलम की पहली गोष्ठी आयोजित की और फिर साहित्य के उस चुंबकीय धागे ने साहित्यकारों आकर्षित करना शुरू कर दिया। इस तरह से इस संस्था की मासिक गोष्ठी होने लगी और लोग पुस्तक पर चर्चा, कविता और सामाजिक चितन जैसे कार्य करने लगे।

दिग्गज करने लगे शिरकत

शहर में बहुत से साहित्यकार बसने लगे। साहित्य अकादमी से लेकर विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त साहित्यकारों के आ जाने से गुरुग्राम साहित्य का गढ़ बनने लगा। मन्नू भंडारी, निर्मला यादव, चंद्रकांता और आचार्य निशांत केतु जैसे राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों ने यहां अपना निवास बनवाया। यहां की गोष्ठियों में कवयित्री दिनेश नंदिनी डालमिया जैसी हस्तियां भी आती रहीं थीं।

हिदी साहित्य को लेकर नहीं दिखी ललक

आपका बंटी और महाभोज सरीखे उपन्यासों से साहित्य जगत की सशक्त हस्ताक्षर बनी मन्नू भंडारी भी डीएलफएफ फेज थ्री में रहती थीं। उनकी बेटी कथक नृत्यांगना और हंस पत्रिका की प्रबंध निदेशक रचना यादव का कहना है कि हिदी साहित्य को लेकर गुरुग्राम में वह ललक नहीं दिखी। जितने भी आयोजनों की बात होती थी वह हमेशा दिल्ली और नोएडा में ही सुनी है। यहां के स्कूलों में अंग्रेजी का बोलबाला कहीं न कहीं हिदी साहित्य के प्रति रुचि को पीछे धकेलता गया। गुरुग्राम में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत कर्मचारियों का रुझान भी अंग्रेजी की तरफ ही है, तो ऐसे में हिदी साहित्य को जो स्थान मिलना चाहिए वह यहां नहीं मिल सका।

गुरुग्राम साहित्य को लेकर एक निर्जन सा स्थान मालूम देता था। धीरे-धीरे कुछ सुधार हुआ तो संस्थाएं बनीं और व्यक्तिगत तौर पर लोगों के प्रयासों ने इस मरुभूमि पर साहित्य के फूल खिलाने शुरू किए। उसका फायदा भी हुआ और लोग जुड़ने लगे, गोष्ठियां होने लगीं और जागरूकता की एक मद्धम ही सही लेकिन बयार चलने लगी।

- डा. संतोष गोयल, वरिष्ठ साहित्यकार

अंग्रेजी साहित्य में थोड़ी बहुत रुचि तो दिखती है लेकिन कम से कम नए गुरुग्राम में हिदी को लेकर कोई खास ललक नहीं दिखती। लोगों की सोच और अंदाज उस तरह का नहीं है कि वे हिदी साहित्य में रुचि ले सकें। साहित्य में रुचि रातोंरात नहीं जगाई जा सकती, इसके लिए बालपन से ही मन में इसका बीजारोपण किया जाता है और स्कूलों में तो अंग्रेजी पढ़ाई जाती है, ऐसे में वह ललक जाग नहीं पाती।

- रचना यादव (वरिष्ठ साहित्यकार स्व. मनु भंडारी की पुत्री)

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