हर धर्म में एक समय होता है जो आपको खुद से जोड़ता है। वह समय जब आप सबकुछ भूलकर अपने आप का शुद्धिकरण करे। रमजान में रोजा रखने का प्रावधान इसलिए है ताकि हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रख सकें। अपनी आंखों, जुबान और अपने मन पर नियंत्रण हो सके। अपने आप से कनेक्ट कर सकें। केवल रोजा, नमाज सहरी और इफ्तार की बात नहीं। यह पूरा महीना यह सिखाता है कि वास्तव में जीवन कैसा होना चाहिए। आज के दौर में हमलोग जरूरत से ज्यादा खाने-पीने और भोग-विलास में लगे हैं। रमजान सिखाता है कि हमें उतना ही खाना-पीना चाहिए जितना ¨जदा रहने के लिए जरूरी है। अत्यधिक खान-पान और भोग-विलास ने कई शारीरिक और मानसिक बीमारियों को जन्म दिया है। रमजान के महीने में रोजे के साथ मुसलमान मन, शरीर और आत्मा को संतुलित करते हैं। हर धर्म में इस तरह की कुछ परंपराएं हैं जो व्यक्ति को खुद से जोड़ें जैसे ¨हदू धर्म में साल में दो बार नवरात्र आते हैं। इस दौरान लोग व्रत रखकर तन और मन की शुद्धि करते हैं।

रमजान केवल अल्लाह की इबादत का समय नहीं बल्कि खुद को पूरे साल के लिए तैयार करने का वक्त है। सामाजिकता का संदेश भी देता है रमजान। इसमें ईद का त्योहार पड़ोसियों के साथ मिलकर मनाने, गरीबों की मदद करने का प्रावधान है। आज के दौर में भी यह उतना ही सामयिक है। अगर हमारा खाना-पीना कम होगा तो हममें बीमारियां कम होंगी। मन में अच्छे और सकारात्मक विचार आएंगे तो तन और मन तो स्वस्थ रहेंगे ही समाज के लिए बेहतर व्यक्ति और परिवार के लिए एक बेहतर सदस्य बन सकेंगे। जीवन में आत्म साक्षात्कार जरूरी है। रमजान वह समय है जो खुद को खुद से मिलाता है।

By Jagran