गुरुग्राम/भोंडसी, [सतीश राघव]। वीरों की जन्मस्थली कही जाने वाली पंचायत भोंडसी में ऐसे सैनिक भी हुए हैं जिन्होंने शरणार्थियों की रक्षा करते हुए अपनी जान देना बेहतर समझा लेकिन शरण लिए हुए लोगों को छोड़ना पसंद नहीं किया, वह भी विदेश की धरती पर। ऐसे ही वीर सपूत हुए हैं गुरुग्राम जिले के भोंडसी में जन्मे कंवरपाल सिंह राघव।

सूबेदार थे कंवरपाल सिंह
कंवरपाल सिंह राघव सेना में सूबेदार थे। सूडान में जब हालत काफी खराब हो गए तो शांति सेना में भारत ने भी अपने सैनिक भेजे। कंवरपाल राघव सूडान भेजी गई शांति सेना में शामिल हो गए। उन्हें 19 दिसंबर, 2013 को सूडान के अकोबो जोईलेई में टीओबी शिविर में शरण लिए हुए एक जाति विशेष के लोगों के रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई।

हत्‍या करने के लिए जुटे विद्रोही
इसी तारीख की रात को जाति विशेष के लोगों की हत्या करने के लिए वहां के हजारों विद्रोहियों ने एकजुट होकर देर रात शरण लिए हुए लोगों के शिविर पर हमला बोल दिया। उधर हजारों की संख्या में हमलावर विद्रोही इधर उनकी सुरक्षा में लगे मुट्ठी भर शांति सैनिक। विकट स्थिति थी। समय कम था। फिर भी शांति सैनिकों ने शिविर में शरण लिए हुए लोगों की जान बचाने के लिए कंवरपाल के नेतृत्व में जवानों ने विद्रोहियों को मुंहतोड़ जवाब दिया।

शरणार्थियों की रक्षा एकमात्र लक्ष्‍य
शांति सैनिकों को अपनी संख्या कम होने और हमलावरों की संख्या अधिक होने की चिंता नहीं थी। उनका तो बस एक ही लक्ष्य था शरणार्थियों की रक्षा करना। शरणार्थियों की रक्षा के दौरान सूबेदार कंवरपाल के सीने में आठ गोलियां लगी और वह शहीद हो गए थे। इसके बाद तो उनके जवान विद्रोहियों पर टूट पड़े और उन्हें खदेड़ कर ही दम लिया।

पत्‍नी से कहा जिंदगी रही तो मिलेंगे नहीं तो तिरंगे में लिपट कर आएंगे
सूडान जाने से पहले कंवरपाल सिंह 15 दिनों के अवकाश पर घर भोंडसी आए थे। उन्हें सूडान की परिस्थितियों के बारे में जानकारी थी। सूडान रवाना होने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी स्नेहलता से कहा था, ‘जिंदगी रहेगी तो फिर मिलेंगे नहीं तो तिरंगे में लिपट कर आएंगे। देश के लिए अगर मैने जान भी दे दी तो बेटे को लिखा-पढ़ाकर सेना में अफसर बनाना।’ सूबेदार कंवरपाल सिंह के ये शब्द अंतिम साबित हुए। वे लौटे तो लेकिन तिरंगे में लिपटकर।

15 दिनों की छुट्टी से लौटे थे सूबेदार
घर पर पंद्रह दिनों की छुट्टी काटने के बाद सूबेदार अपनी टुकड़ी के साथ मई 2013 को सूडान पहुंच गए थे जहां पर आतंरिक विद्रोह करने वालों के खिलाफ शांतिसेना लड़ रही थी।

कंवरपाल दसवीं पास करने के बाद दस जून 1986 को सेना में भर्ती हुए थे। ट्रेनिंग के बाद उनकी पहली नियुक्ति कश्मीर के दुर्गम इलाकों में हुई।

कई बार दुश्‍मनों को किया था ढेर
पाकिस्तान की ओर से अघोषित युद्ध में उन्होंने अपने टुकड़ी का साथ देते हुए कई बार दुश्मनों को ढेर किया था। अपनी बहादुरी के बल पर ही वे प्रोन्नति पाते गए और सूबेदार बन गए थे। पराक्रम व बेहतर सैन्य संचालन को देखते हुए उनकी नियुक्त सूडान जाने वाली शांति सेना में हुई थी।

पति के शहीद होने पर पत्नी ने हौसला नहीं खोया
पति के शहीद होने पर पत्नी स्नेहलता ने अपना हौसला नहीं खोया। उन्होंने अपने पति की इच्छा के अनुरूप बच्चों का पालन पोषण करना शुरू कर दिया। वे अपने पति के वही शब्द दोहराते हुए कहती हैं कि मुझे गर्व है कि मेरे पति ने देश की ओर से दी गई जिम्मेदारी को निभाते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। अब इस वीरांगना का एक ही लक्ष्य है कि बेटा भी सेना में अफसर बने और अपने पिता की तरह गांव, प्रदेश और देश का गौरव बढ़ाए।

बेटा कर रहा एनडीए  की तैयारी 
पिता कंवरपाल शहीद हुए उस वक्‍त बेटी अंजली व बेटा कुणाल छोटे थे। पति को खोने के बाद स्नेहलता ने धीरज नहीं खोया। उन्होंने परिवार को तो संभाला ही, दोनों बच्चों का अच्छी शिक्षा भी दिलाई। बेटी पढ़ाई कर सरकारी नौकरी में लग चुकी है। बेटा 12वीं पास करने के बाद एनडीए की तैयारी भी कर रहा है।

पत्‍नी के दृढ़निश्चय  
मेरे पति ने देश का नाम रोशन किया। बेटा भी सेना में भर्ती होकर मां भारती की आन-बान-शान को बढ़ाएगा। सूबेदार साहब की भी यही इच्छा थी कि बेटा देश सेवा के लिए आगे बढ़े।

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Posted By: Prateek Kumar