भारत में कॉमेडी को बतौर प्रोफेशन अपनाने की परंपरा ज्यादा पुरानी नहीं है। महमूद, जॉनी वॉकर और जानी लीवर जैसे फिल्मी कलाकारों को छोड़ दें तो बस क्षेत्रीय मंचों पर फिल्मी कलाकारों की मिमिक्री करने वाले कॉमेडी कलाकार ही इस प्रोफेशन की पहचान थे। लेकिन धीरे-धीरे स्टैंड-अप कॉमेडी विकसित हुई और आज इसे रोजगार की मुख्यधारा से जोड़कर देखा जा रहा है। कई कॉलेजों में कॉमेडी को बतौर प्रोफेशनल कोर्स की तरह पढ़ाया जाने लगा है। फिल्मी या कुछ गिने-चुने हास्य कलाकारों ने कॉमेडी को जो शुरुआती मंच या नींव दी उसे आज की पीढ़ी आगे ले जा रही है। नई पीढ़ी के लिए राह बनाने के साथ भारतीय स्टैंड-अप कॉमेडी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में दिल्ली की 44 वर्षीय वासु प्रिमलानी का भी अहम योगदान रहा है। प्रस्तुत हैं विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर साइबर हब में आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने आईं राष्ट्रपति के हाथों 'नारी शक्ति सम्मान' हासिल करने वाली पहली स्टैंड-अप कॉमेडियन वासु प्रिमलानी से दैनिक जागरण संवाददता हंस राज की बातचीत के प्रमुख अंश : आपके कार्यक्रम गुरुग्राम में होते रहे हैं, यहां का अनुभव कैसा रहा है?

- गुरुग्राम से मेरा वर्षों पुराना रिश्ता है। न्यूयार्क सिटी, सैन फ्रांसिस्को, दुबई, मुंबई और बेंगलुरु जैसे कई शहरों में प्रस्तुति देने के बाद मैं कह सकती हूं कि जितना इंटरैक्टिव ऑडियंस यहां मिलता है, किसी और शहर में देखने को नहीं मिलता। भारत को क्यों विविधताओं का देश कहा जाता है, इसकी झलक भी यहां देखने को मिल जाती है। एक परफॉर्मर की पहली कोशिश यही होती है कि वो जल्द से जल्द दर्शकों से कनेक्ट हो सके। अमूनन मेरी प्रस्तुति एक घंटे से ज्यादा की होती है लेकिन इस बार भी यहां करीब 35 मिनट में ही लोगों ने संपूर्णता का एहसास करवा दिया। एक और खास बात रहती है कि यहां हर उम्र के दर्शक मिल जाते हैं तो उनसे जुड़ना आसान रहता है।

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कॉमेडी को आपने रोजगार के तौर पर चुना, क्या चुनौतियां आईं?

आज भी हमारे देश में कॉमेडियंस को लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं। मैंने दस साल पहले जब कॉमेडी को अपना प्रोफेशन बनाने का मन बनाया था, तब यहां कुछ गिने-चुने लोग ही थे जो इस दिशा में अपना भविष्य तलाश रहे थे। एक तो नया क्षेत्र और ऊपर से ऐसा क्षेत्र जहां सबसे ज्यादा जेंडर गैप हो तो राहें मुश्किल ही रही हैं। हां, इंटरनेट और सोशल मीडिया के आ जाने के बाद लोगों को लोकप्रियता मिलने लगी और आज कॉमेडी का बाजार समृद्ध हो गया है। पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में कई प्रतिभाएं उभरकर सामने आ रही हैं लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि कॉमेडी सिर्फ मनोरंजन और पैसा बनाने का माध्यम नहीं है। दुनिया के कई देशों में स्टैंड-अप कॉमेडियन अपनी प्रस्तुति से जन जागरुकता लाने का काम कर रहे हैं। व्यंग्य के लहजे में सरकार से सवाल कर रहे हैं और अपनी बातें मनवा रहे हैं। नए कॉमेडियंस को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

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आप खुद को फेमिनिस्ट कॉमेडियन मानती हैं, कोई खास वजह?

बचपन का अधिकांश समय अमेरिका में ही बीता। वहां रहते हुए मैंने इंटरनेशनल व कॉम्प्लेक्स कॉमेडी की बारीकियों को सीखा। साथ ही यह भी जाना कि स्टैंड-अप कॉमेडी सिर्फ पैसा बनाने का जरिया नहीं है। इसलिए शुरुआती दिनों से ही मैंने बच्चों के शोषण, महिलाओं के शोषण और उनके साथ होने वाली छेड़छाड़ को अपनी प्रस्तुतियों में शामिल करना शुरू कर दिया। एक महिला होने के कारण कहीं न कहीं मैंने खुद ऐसी घटनाओं का सामना किया है, तो दूसरों को जागरूक करने के लिए अपनी प्रतिभा का सहारा लिया। कॉमिक एक्ट में मैं महिलाओं के साथ सड़कों पर होने वाली आम परेशानियों जैसे छेड़छाड़, घूरना आदि को दर्शाती हूं और इसके लिए दर्शकों को मंच पर बुलाकर उन्हें महसूस करवाती हूं कि एक लड़की के लिए ऐसा माहौल कितना मुश्किल या तकलीफदेह होता है।

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इन दिनों आप स्टैंड-अप कॉमेडी के अलावा क्या कर रही हैं?

विभिन्न क्षेत्रों में सक्रियता के कारण मुझे शुरू से ही 'मल्टीटा¨स्कग वुमन' बुलाया जाने लगा था। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (लॉस एंजिल्स) से ज्योग्राफी, अर्बन प्ला¨नग एंड लॉ में मास्टर करने के बाद मैंने कई विश्वविद्यालयों में प्राध्यापन किया है। फिलहाल देश-विदेश की दुष्कर्म पीड़िताओं के साथ मिलकर विभिन्न शहरों में जाकर लोगों को अपनी आवाज उठाने के लिए जागरूक कर रही हूं। इसके अलावा सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन द्वारा नेशनल लेवल पर ट्रांसपोर्टेशन में किस प्रकार से एनर्जी बचाई जा सकती है, इस पर शोध कर रही हूं। आइआइटी हैदराबाद के विद्यार्थियों को स्टैंड-अप कॉमेडी की बारीकियां सिखाने भी जाती हूं।

Posted By: Jagran

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