प्रियंका दुबे मेहता, गुरुग्राम

केवल मंदिरों को ही नहीं, इतिहास को भी तोड़-मरोड़कर उसे नष्ट करने का काम भी औरंगजेब ने किया था। अपने शासनकाल के दूसरे दशक की शुरुआत में उसने सभी काल क्रम के अभिलेख मिटा दिए और आगे से किसी भी लेखन को बंद करवा दिया। यही कारण है कि उस दौरान के इतिहास और औरंगजेब के कृत्यों का ब्योरा शाही दस्तावेजों में खास नहीं मिलता। औरंगजेब ने जब मंदिरों और शिक्षा के स्थलों को ध्वस्त करने के आदेश दिए थे और इसका लेखा-जोखा इनायत खान के मुंशी मोहम्मद साफी मुस्तइद खां ने मआसिर-ए-आलमगीरी में दिया है। इसके अलावा 1660 ई. और 1665 ई. के बीच बनारस आए दो फ्रांसीसी यात्रियों बर्नियर और तावेर्निए के यात्रा वर्णन में भी जिक्र है कि विश्वनाथ मंदिर वहां था।

इतिहासकार और लेखक मोती चंद्र ने अपनी पुस्तक 'काशी का इतिहास' में इस बात का उल्लेख किया है कि 1660 ई. और 1665 ई. के बीच बनारस आए दो फ्रांसीसी यात्रियों बर्नियर और तावेर्निए के समय औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता का शिकार नहीं बन पाया था और इसका वर्णन ट्रावेल्स इन इंडिया बाई जें बापतीस्त तावर्निए- बी बाल, भाग एक के पृष्ठ संख्या 118-119 (लंदन 1889) में मिलता है। इसमें बनारस को बेहतरीन शहर के तौर पर वर्णित किया गया है।

डा. मोती चंद्र ने लिखा है कि 17 जु-अल-कदा हिजरी 1079 यानी 18 अप्रैल 1669 में मआसिर-ए-आलमगीरी में इस धार्मिक उत्पीड़न का जिक्र किया गया था और इसका उल्लेख ईलियट के सातवें भाग में भी मिलता है। इसके अनुसार औरंगजेब को इस बात की खबर मिली कि कुछ लोग अपनी रद्दी किताबों से शरारती ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दे रहे हैं। यह बात सुनकर औरंगजेब ने विश्वनाथ का मंदिर गिराने के आदेश दिए थे। 15 रबी-उल-आखिर (दो सितंबर 1669) को एक खबर पहुंची कि उसकी आज्ञा के अनुसार विश्वनाथ का मंदिर गिरा दिया गया है। डा. मोती चंद्र लिखते हैं कि केवल मंदिर ही नहीं गिराया गया बल्कि उस पर ज्ञानवापी की मस्जिद भी उठा दी गई। पुराने मंदिर की पश्चिमी दीवार गिराकर पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी द्वार बंद कर दिए गए। चारों अंतरगृह बचा लिए गए और मंदिर के शिखर को गुंबद, मंडपों को मस्जिद की दालानों में बदल दिया गया और गर्भगृह को मस्जिद की मुख्य दालान बना दी गई थी।

औरंगजेब के कुकृत्य इतिहास के पन्नों में न दर्ज हो सकें, उसने इसका भी पूरा प्रबंध करना चाहा और अपने शासन काल के दूसरे दशक में उसने सभी अधिकारिक दस्तावेज और शाही लेख लिखने पर रोक लगा दी। इसका जिक्र इतिहासकार स्टेनली लेनपूल ने 'औरंगजेब एंड द डिके आफ द मुगल एंपायर' में किया है। काशी का इतिहास में मोती चंद्र ने लिखा है कि औरंगजेब ने यह तर्क दिया था कि मंदिरों में गैर इस्लामिक चीजें पढ़ाई और सिखाई जाती हैं। उसने अपने हतोत्साहित सैनिकों को भी यही कह कर हौसला दिया था कि यह ऊपर वाले की इच्छा है कि यह मंदिर ध्वस्त किए जाएं।

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