मणिकांत मयंक, फतेहाबाद

हरियाणा स्कूल शिक्षा बोर्ड का परिणाम निश्चित तौर पर सुखद माना जाएगा। दसवीं कक्षा के इस बेहतर परिणाम के अनेक कारक भी शिक्षाविद मान रहे हैं। अहम यह कि अबकी बार शिक्षा विभाग ने परीक्षा परिणाम में सुधार की लक्ष्मण रेखा खींच दी थी। स्कूलों के समक्ष न्यूनतम 10 फीसद सुधार का लक्ष्य था। साथ ही, इस संकल्पित लक्ष्य को कोविड-19 से उठी सहानुभूति का साथ भी मिला। ऐसे कुछ कारकों ने रिजल्ट का स्तर ऊंचा करने की सरकार की संवेदना को खूबसूरत सहारा दिया।

अहम यह भी कि अगस्त, 2019 में उत्कर्ष पर पहुंची सरकार की ट्रांसफर पॉलिसी ने अपना पार्ट बखूबी प्ले किया। टीचर्स के सरप्लस पद रोक दिये गए। इससे हुआ यह कि शिक्षकों की उपलब्धता कमोबेश हर स्कूल में हो गई। कुछ स्कूलों में डेपूटेशन पॉलिसी का भी योगदान रहा। सिलेबस बचा नहीं। हां, खास बात यह भी कि विज्ञान विषय का पेपर न होना भी लक्ष्य को कमतर करने में महत्वपूर्ण रहा। विज्ञान में औसत के आधार पर 74 फीसद अंक पाने वाली सुनीता कहती है कि यह उनके लिए अच्छा रहा। शिक्षाविद विकास कुमार मानते हैं कि मार्किंग ने भी महति भूमिका निभाई। अबकी बार टेबल मार्किंग नहीं हुई। घर से पेपर जांच हुई। कोरोना काल में हुई मार्किंग में स्वाभाविक सहानुभूति रही। ऐसे तमाम कारकों ने मिलकर कोरोना के दौरान परीक्षा परिणाम को राज्य स्तर पर मजबूती दी। राज्य स्तर पर 10 फीसद तो कई जिलों में 15-18 परसेंट रिजल्ट में सुधार आया है।

इच्छा शक्ति की बदौलत सुधरा परिणाम: सिहाग

जिला शिक्षा अधिकारी दयानंद सिहाग इसे नई दिशा देने वाला परिणाम मानते हैं। वह कहते हैं कि विद्यार्थियों की मेहनत के साथ स्कूलों में सुधार की इच्छा-शक्ति का यह सुखद परिणाम है। संकट काल में आया परिणाम संकल्प को नई ऊंचाई देगा।

Posted By: Jagran

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