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घर की चारदीवारी से निकली हरियाणा की नेहा रानी, नोटबुक के कारोबार से आज कमा रही सात लाख रुपये सालाना

Published: Wed, 07 Oct 2026 03:41 PM (IST)

रताखेड़ा गांव की नेहा रानी ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर घर में नोटबुक बनाने का काम शुरू किया, जो अब सालाना 7 लाख रुपये का कारोबार बन गया है।

रताखेड़ा गांव की नेहा रानी (जागरण फोटो)

 रताखेड़ा गांव की नेहा रानी (जागरण फोटो)

HighLights

  1. नेहा रानी ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर नोटबुक व्यवसाय शुरू किया

  2. उनका व्यवसाय अब सालाना सात लाख रुपये का कारोबार बन गया है

  3. नेहा रानी अन्य महिलाओं को भी पार्ट टाइम रोजगार दे रही हैं

जागरण संवाददाता, फतेहाबाद। कभी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली रताखेड़ा गांव की नेहा रानी अब अपने पैरों पर खड़ी हैं।

बीए तक पढ़ाई करने के बावजूद रोजगार का अवसर नहीं मिला तो परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित रहीं। सात सदस्यों वाले परिवार की आय मुख्य रूप से खेती पर निर्भर थी। ऐसे में नेहा ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपने हुनर को कारोबार में बदलने की ठानी।

घर से शुरू किया नोटबुक बनाने का काम आज करीब सात लाख रुपये सालाना कारोबार तक पहुंच चुका है। इतना ही नहीं, अब नेहा दूसरी महिलाओं को भी पार्ट टाइम रोजगार दे रही हैं।

फरवरी 2023 में हरियाणा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की टीम गांव पहुंची तो महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के लिए प्रेरित किया गया। नेहा ने आसपास की महिलाओं को साथ लेकर 20 फरवरी को हरमन महिला स्वयं सहायता समूह का गठन किया। महिलाओं ने उनकी पढ़ाई, व्यवहार और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उन्हें समूह में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी।

नोटबुक बनाने का हुनर बना कारोबार

नेहा पहले से घर पर नोटबुक बनाने का काम करती थीं। समूह से जुड़ने के बाद मिशन के स्टाफ ने उन्हें इसे बड़े स्तर पर ले जाने के लिए प्रोत्साहित किया।

24 अगस्त 2024 को उन्होंने घर में एक बड़ा कमरा तैयार करवाकर नोटबुक बनाने की मशीनें लगाईं। स्वयं सहायता समूह, ग्राम संगठन और क्लस्टर संगठन से करीब 1.50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता मिली। इससे थोक में कच्चा माल खरीदकर स्कूलों के नाम वाली कॉपियां तैयार कर आसपास के स्कूलों में बेचनी शुरू कीं। बाद में डायरी और नोटपैड भी बनाने लगीं।

कारोबार बढ़ा तो पति ने भी थामा हाथ

शुरुआत में नेहा अकेले यह काम संभालती थीं, लेकिन कारोबार बढ़ने के साथ पति सुशील कुमार भी साथ देने लगे। खेती के साथ अब वह पत्नी के कारोबार में हाथ बंटा रहे हैं। नेहा को बैंक से करीब 50 हजार रुपये का मुद्रा ऋण भी मिला।

मेहनत का नतीजा यह रहा कि आज दोनों मिलकर कारोबार से करीब सात लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं और शुरुआती निवेश लगभग वापस हो चुका है।

नेहा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि जिस रोजगार की तलाश वह कभी खुद कर रही थीं, आज वही अवसर दूसरी महिलाओं को दे रही हैं। नोटबुक बनाने के काम में महिलाओं को पार्ट टाइम रोजगार मिल रहा है। नेहा कहती हैं कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें अपने हुनर को पहचान देने का अवसर मिला। स्वयं सहायता समूह महिलाओं को केवल आर्थिक सहयोग ही नहीं देते, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और अपनी पहचान बनाने का अवसर भी देते हैं। सही मार्गदर्शन, सहयोग और मेहनत से महिलाएं परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही है। -सुरेश कुमार, सीईओ डीआरडीए।