जागरण संवाददाता, बल्लभगढ़ : 'मेरी ननद रूठी है, मैं तो उसे मनाने आई रे, संग सहेली, भाभी साथ लाई रे' जैसे लोकगीतों पर महिलाओं ने लोकनृत्य करके मकर संक्रांति के मौके पर रूठों को मनाने की परंपरा को निभाया। रूठों को मनाने की परंपरा का अर्थ बुजुर्गों व बड़ों को उपहार स्वरूप कपड़ों, सम्मानित करना है। ज्यादातर बहुएं अपने बुजुर्गों या फिर रिश्ते में बड़ों को मना रहीं थी।

ऐसा ही एक नजारा सेक्टर-2 में देखने को मिला। यहां पर सुमन ने अपनी ननद ¨पकी को रूठने पर मनाने की परंपरा निभाई। ¨पकी घर से दूर किसी के पास जाकर बैठी हुई थी। सुमन अपनी सहेलियों के साथ लोकगीत गाती हुई उन्हें मनाने के लिए गई। वहां पर पहुंच कर उन्होंने कपड़े, मिठाई दी। ऐसे ही शहर के आसपास के गांवों में भी देखने को मिला। आधुनिकता की दौड़ में अब त्योहारों का रंग फीका होता जा रहा है। पहले मकर संक्रांति पर गांवों में दर्जनों कार्यक्रमों का आयोजन होता था, अब मुश्किल से एक कार्यक्रम आयोजित होता है।

-कविता पहले लड़कियां स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने के लिए नहीं जाती थी, वे लोकगीत और लोकनृत्य में पारंगत होती थी, अब शिक्षा ग्रहण करने के बहाने लड़कियां अपनी संस्कृति से दूर हो रही हैं।

-सुनीता मकर संक्रांति हर्षोल्लास का पर्व है। इस तरह के आयोजन होते रहने चाहिए, तभी अपने त्योहारों की परंपरा कायम रह पाएगी।

-प्रोमिला त्योहारों की मस्ती जितनी पहले होती थी, अब नहीं रही, इसका सबसे बड़ा कारण टीवी चैनल हैं। अब सभी त्योहारों का गांवों में भी शहरीकरण होता जा रहा है, हमारा यह प्रयास है कि नई पीढ़ी भी इसको देखे और हमारी यह समृद्ध परंपरा व संस्कृति बची रहे।

-अंजू

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