ओलंपिक में पिता जीतना चाहते थे मेडल, सपना पूरा न हुआ तो बेटे को बनाया पहलवान; एशियन गेम्स में चरखी दादरी के सुजीत ने गाड़ा झंडा
सुजीत कलकल ने एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर अपने पिता दयानंद कलकल के अधूरे सपने को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है।

एशियन गेम्स में चरखी दादरी के सुजीत ने गाड़ा झंडा। फोटो जागरण
HighLights
एशियन गेम्स में सुजीत कलकल ने जीता स्वर्ण पदक।
पिता दयानंद कलकल का अधूरा ओलंपिक सपना पूरा करने की ओर।
घर पर 13 सालों से पिता-पुत्र कर रहे हैं कुश्ती अभ्यास।
जागरण संवाददाता, चरखी दादरी। चरखी दादरी जिले के गांव इमलोटा निवासी भारतीय पहलवान सुजीत कलकल ने एशियान गेम्स में गोल्ड जीतकर एक और बड़ी उपलब्धि अपने नाम कर ली है। सुजीत की इस सफलता में उनकी मेहनत के साथ-साथ पिता दयानंद कलकल की वर्षों की तपस्या भी जुड़ी है।
जिस सपने को दयानंद खुद पूरा नहीं कर पाए, उसे उन्होंने बेटे सुजीत की मेहनत और प्रतिभा के जरिये साकार करने का संकल्प लिया था। पिता और बेटे की यह जोड़ी आज भी मैट पर साथ पसीना बहाती है और लगातार स्वर्णिम अध्याय लिख रही है।
दयानंद न केवल सुजीत के पिता हैं, बल्कि उनके शुरुआत से कोच भी रहे हैं। यहां तक की उन्होंने घर पर ही कुश्ती मैट लगा दिया और बीते 13 सालों से बाप-बेटा वहां ओलिंपिक मेडल का लक्ष्य लेकर पसीना बहा रहे हैं। एशियन गेम्स में ओलिंपियन चैंपियन पहलवान सहित दूसरे नामी पहलवानों को जिस प्रकार सुजीत ने पटखनी दी है उनकी इस लय को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सुजीत कलकल पिता के सपने को जल्द पूरा करेंगे।
वहीं, पिता दयानंद एशियन गेम्स को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे और उनको बेटे पर गोल्ड मेडल जीतने का भरोसा था जिस पर सुजीत खरे उतरे हैं। हालांकि फाइनल मैच देखने के दौरान जिस प्रकार 2-9 से सुजीत पिछड़ रहे थे उसको देखकर परिवार के दूसरे सदस्य तो नर्वस हो गए थे लेकिन पिता को बेटे की जीत का पूरा भरोसा था।
क्या था पिता का सपना?
सुजीत के पिता दयानंद कलकल खुद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में भी प्रतिनिधित्व किया। उनका सपना ओलिंपिक में देश के लिए पदक जीतने का था, लेकिन यह सपना पूरा नहीं हो सका।
इसके बाद उन्होंने वर्ष 2013 में बेटे सुजीत को पहलवान बनाने का फैसला लिया। घर में ही कुश्ती का मैट बिछाया गया और सुजीत को नियमित प्रशिक्षण देना शुरू किया। दयानंद ने करीब आठ वर्षों तक सुजीत को घर पर ही कुश्ती की बारीकियां सिखाईं।
सुबह से लेकर शाम तक अभ्यास, फिटनेस और तकनीक पर विशेष ध्यान दिया गया। पिता की निगरानी में लंबे समय तक अभ्यास करने के बाद सुजीत को प्रतियोगिताओं के मैदान में उतारा गया। शुरुआत से ही सुजीत ने अपनी तकनीक और फुर्ती से अलग पहचान बनाई।
अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में जीत चुके गोल्ड
अंडर-23 विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के बाद सुजीत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने कई मुकाबलों में जीत हासिल की और लगातार आधा दर्जन से अधिक खिताब जीत चुके हैं।
उन्होंने 2025 में सीनियर वर्ल्ड रैकिंग में दो बार गोल्ड मेडल, अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड, वर्ल्ड सीनियर रैकिंग चैंपियनशिप में दो गोल्ड,सीनियर एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड इत्यादि मेडल हासिल किए हैं।
उनकी लगातार सफलता ने उन्हें कुश्ती जगत में ना केवल नई पहचान दिलाई बल्कि उन्होंने यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग रैंकिंग में 65 किलोग्राम फ्रीस्टाइल श्रेणी में दुनिया के नंबर वन पहलवान बने। इसके अलावा प्रो-रेसलिंग लीग में उनका जलवा देखने को मिला।
ये दांव हैं सुजीत की पहचान
सुजीत के पिता दयानंद कलकल ने बताया कि सुजीत पहले हाफ में डिफेंस करते हैं जबकि दूसरे हाफ में अटैक करते हैं। उनकी यहीं शैली उन्हें पिछड़ने के बावजूद वापसी करवाती है। फाइनल में भी इसी प्रकार का गेम देखने को मिला और उन्होंने दूसरे हाफ में जबरदस्त वापसी की। पिता ने बताया कि मैट पर सुजीत की फुर्ती और तकनीक उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
गर्दन दबाकर तेजी से पीछे जाना, डबल लेग, फीतले बांधना और भारंदाज उनके पसंदीदा दांव हैं। मुकाबले के दौरान वह प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी को भांपकर तेजी से हमला करने के लिए जाने जाते हैं। पिता दयानंद ने प्रशिक्षण के दौरान इन तकनीकों को और धार देकर उन्हें जापान भेजा।
जहां उन्होंने बड़ी चुनौती माने जा रहे जापानी व ईरानी पहलवान को धूल चटाकर शान से तिरंगा लहराया। दयानंद कलकल ने बताया कि शुरू से उनका फोकस रहा है कि जो मजबूत कड़ी है उसको और अधिक मजबूत किया जाए और कमजोर कड़ी में सुधार करने का प्रयास किया। उसका उन्हें परिणाम मिला है और बेटे ने एशियन गेम्स में गोल्ड जीतकर देशवासियों को गौरवांवित महसूस कराया है।
