बहादुरगढ़ (वि.): किला मुहल्ला के श्रीदुर्गा मंदिर अयोध्यापुरी में व्यास पूजन के उपलक्ष्य में आयोजित सदगुरू आराधना पर्व पर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने कहा कि जीवन में सत्संग का बहुत महत्व है। सत्संग से ही बुद्धि-विवेक तथा हृदय सद्भाव से भरता है। एक घड़ी का सत्संग भी जीवन को रूपांतरित कर सकता है, लेकिन कथा प्रवचन के नाम पर बड़े-बड़े समागमों को ही सत्संग मान लेना बड़ी भूल है। लोगों को लगता है कि जब एक घड़ी के सत्संग से करोड़ों पाप कट जाते हैं तो हम लोग तो कितने वर्षों से समागम में जाकर सत्संग सुन रहे हैं। तब तो हमारे भी अनंत पाप कट गए होंगे? मगर सत्य यह है कि सद्गुरूदेव का सानिध्य हमारी सभी भ्रांतियों को दूर करता है। जिन समागमों को हम सत्संग मान बैठते हैं, यह बाहरी समागम हमें वास्तविक सत्संग की विधि बताते हैं। सत्संग तो ज्ञानदीप हैं, जिसकी विधि संत समागम से मिलती है। ज्ञान दीप प्रज्ज्वलित होते ही कितने भी वर्षों पुराना अज्ञानता रूपी अंधकार हो, वह दूर हो जाता है। विधियां पाठ करने के लिए नहीं प्रयोग के लिए होती हैं। संत को स्थूल देह रूप में नहीं बल्कि बोधमय स्वरूप में देखना होता है। उनके बोध को स्वयं में धारण करना होता है। प्रवचन सुनना ही धर्म नहीं बल्कि उसे जीवन में प्रयोग रूप देना धर्म है। सत्संगति यदि आचरण में नहीं है तो इसे विसंगति कहा जाएगा। पथ भ्रष्ट होने से बचने के लिए सत्संगति प्रेरक होती हैं, जो घंटों बैठकर पंडालों में सुना जाता है, सत्संग वह नहीं। सुनकर जो आचरण में आ जाए, वह सत्संग है। आदर्शों के उच्च शिखर को छूने के लिए विवेकपूर्वक प्रयास होना चाहिए। पानी को नीचे से ऊपर उठाना हो तो मोटर चाहिए, नीचे गिरने के लिए कुछ नहीं चाहिए। फिसला और गया। इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ गुरूदेव की पादुका पूजन से हुआ। इस दौरान नीव मल्होत्रा, उमेश सहगल, कृष्ण चावला, उपांशु दीवान, संजीव मलिक, कैलाश राठौर मौजूद रहे।

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