जागरण संवाददाता, अंबाला शहर : शहर के एक वकील ने अपनी मां की सेवा के लिए केयरटेकर रखी थी, लेकिन आरोपित युवती की पुलिस वेरिफिकेशन नहीं करवाई। हालांकि आरोपित युवती की फोटो लेने के साथ-साथ अन्य दस्तावेज चेक कर पूरी एहतियात भी बरती गई थी। पुलिस वेरिफिकेशन नहीं होने का फायदा उठाते हुए युवती ठगी कर फरार हो गई।

सेक्टर नौ के रहने वाले संजीव पुरी ने बताया कि उसे अपनी 85 वर्षीय मां के लिए केयरटेकर की जरूरत थी। उन्होंने आनलाइन ही एक कंपनी से संपर्क किया था। जिसमें बात करने वाले शख्स ने खुद को राजेश बताया और कंपनी का संचालक दिलीप कुमार को बताया। केयरटेकर की सैलरी सात हजार रुपये तय हुए। आरोपितों ने मामले में एक युवती से वीडियो काल पर बात भी करवाई। इसके बाद युवती को लेकर अंबाला भी पहुंच गए। इस दौरान आरोपितों ने छह माह की एडवांस पेमेंट मांगी, लेकिन वकील ने एडवांस पेमेंट पर आपत्ति जताई। आरोपितों एडवांस लेने पर अड़े रहे। ऐसे में वकील ने बात मान ली और 42 हजार रुपये दे दिए। वकील ने पेमेंट देते समय आरोपितों की फोटो भी ली थी। इसके साथ ही आधार कार्ड समेत अन्य दस्तावेज की जांच की।

------ कोरोना से बचाव को करवाए टेस्ट

घर में बुजुर्ग मां के कारण वकील ने स्वास्थ्य को लेकर भी कोई लापरवाही नहीं बरती। वकील ने आरोपित युवती सुजाता का सरकारी अस्पताल के अलावा निजी अस्पताल में भी कोरोना टेस्ट करवाया। इसके बाद युवती को अपने मकान के ऊपर का हिस्सा रहने को दिया। आरोपित युवती एक दिन भी नहीं टिकी। दोपहर को टेस्ट करवाने के बाद ऊपर गई। शाम को वकील की पत्नी युवती को बुलाने ऊपर पहुंची तो वह फरार हो चुकी थी।

---- -दस्तावेज और सिम सही तो ही आ सकेगी गिरफ्त में

मामले में आरोपित फरार हो चुके हैं, लेकिन उन्होंने अपने दस्तावेज और मोबाइल नंबर दिए हैं। जो नंबर दिया है उस पर बातचीत हो रखी है। यदि यह सही पाया गया तो ही आरोपित पुलिस गिरफ्त में आ सकते हैं। यदि आधार कार्ड समेत अन्य दस्तावेज फर्जी हुए और मोबाइल सिम तक जाली दस्तावेजों पर निकला पाया गया तो आरोपितों तक पहुंचना आसान नहीं होगा।

----------- वेरिफिकेशन के बाद ही घर पर रखें केयरटेकर

यदि किसी को अपने घर में केयरटेकर या हेल्पर रखना है तो पहले उसकी वेरिफिकेशन करवाना लाजिमी है। इसके लिए कोई ज्यादा झंझट नहीं है। आनलाइन ही पूरी प्रकिया होती है। इसकी फीस भी सिर्फ 50 रुपये है। जिसमें आनलाइन अप्लाई करने के बाद एसपी कार्यालय में डाटा पहुंच जाता है। जहां से इसे जांच के लिए थाने में भेज दिया जाता है। जांच के बाद रिपोर्ट वापस वेरिफिकेशन करवाने वाले के पास पहुंच जाती है। लगभग एक सप्ताह में पूरी प्रकिया हो जाती है।

Edited By: Jagran