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अंबाला फ्रीहोल्ड पॉलिसी पर अनिल विज का कड़ा रुख, पुराने निवासियों से शुल्क लेने पर उठाए सवाल

Published: Tue, 11 Aug 2026 11:54 PM (GMT+05:30)

परिवहन मंत्री अनिल विज ने अंबाला छावनी सदर एरिया की फ्रीहोल्ड पॉलिसी पर सवाल उठाए, खासकर 100-150 साल से रह रहे परिवारों से 100% कलेक्टर रेट वसूलने का विरोध किया।

हाईलेवल बैठक में फ्रीहोल्ड पॉलिसी पर विज ने उठाए सवाल।

हाईलेवल बैठक में फ्रीहोल्ड पॉलिसी पर विज ने उठाए सवाल।

HighLights

  1. अनिल विज ने फ्रीहोल्ड पॉलिसी की शर्तों पर सवाल उठाए।

  2. 150 साल से काबिज परिवारों से शुल्क लेने का विरोध।

  3. सरकार को जनहित में विकल्पों पर विचार करने के निर्देश।

जागरण संवाददाता, अंबाला। अंबाला छावनी सदर एरिया को फ्रीहोल्ड करने की हाईलेवल बैठक में हरियाणा के परिवहन मंत्री अनिल विज तल्ख हो गए और पॉलिसी में दी गई शर्तों पर ही सवाल उठा दिए। करीब सौ से डेढ़ सौ साल पहले जमीन पर काबिज हजारों परिवारों से फिर से सौ प्रतिशत कलेक्टर लेने पर विज ने कड़ी आपत्ति जताई।

लोगों के पास जमीन की (मलबा) रजिस्ट्री तक है, लेकिन फिर भी लेकिन फिर भी बनाई गई पॉलिसी में लोगों से पैसे लिए जाएंगे। इस में सबसे सख्त शर्त यह है कि इस पॉलिसी का हर व्यक्ति को पालन करना होगा अन्यथा उसका मकान सील कर सरकार किसी अन्य को बेच देगी।

इसको लेकर भी विज ने बैठक में तल्ख अंदाज में अपनी बात रखी और कहा कि जो लोग पहले से मालिक बने हैं, उनसे मालिकाना हक के लिए सौ प्रतिशत शुल्क लेना बिलकुल गलत है। मंगलवार को शहरी स्थानीय निकाय मंत्री विपुल गोयल के कार्यालय में हाईलेवल बैठक में परिवहन मंत्री अनिल विज, मुख्य सचिव सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। हालांकि अभी अंतिम निर्णय इस पॉलिसी पर नहीं लिया गया है लेकिन अब पॉलिसी बनाने वाले अफसरों को फिर से हाईलेवल मीटिंग में उठे मुद्दों पर विचार करना होगा।

25 प्रतिशत अग्रिम भुगतान पर विचार हुआ

इस बैठक में फ्रीहोल्ड से जुड़ी शर्तों, कलेक्टर रेट, 25 प्रतिशत अग्रिम भुगतान, पुराने दस्तावेजों और गरीब बस्तियों की वास्तविक स्थिति पर विस्तार से विचार हुआ। हालांकि बैठक में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ। सरकार अब कानूनी, प्रशासनिक और आर्थिक पहलुओं को खंगालकर जनहित में विकल्प तलाश रही है।

बैठक में सबसे अहम मुद्दा उन परिवारों का रहा, जो अंबाला छावनी में पीढ़ियों से रह रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, विज ने अधिकारियों के समक्ष यह बात रखी कि कई परिवारों का छावनी क्षेत्र में 100 से 150 वर्ष पुराना निवास है। ऐसे लोगों से मौजूदा कलेक्टर रेट के आधार पर भारी शुल्क वसूलना व्यावहारिक नहीं होगा। इस बात पर भी मंथन हुआ कि फ्रीहोल्ड नीति का मकसद वर्षों से रह रहे लोगों को संपत्ति पर अधिकार दिलाना है तो उसकी शर्तें भी ऐसी होनी चाहिए, जिन्हें आम परिवार पूरा कर सके।

खासतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े, इस पहलू को महत्वपूर्ण माना गया। सबसे बड़ी व्यावहारिक दिक्कत उन परिवारों के सामने है, जिनके पास दशकों या एक सदी से भी पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। सरकार के स्तर पर यह विचार किया जा रहा है कि ऐसी परिस्थितियों में वैकल्पिक प्रमाणों और सरल प्रक्रिया के जरिए वास्तविक कब्जाधारियों को राहत कैसे दी जा सकती है।

अब विकल्प तलाशने के निर्देश

बैठक में कोई औपचारिक निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया। सूत्रों के मुताबिक सरकार जल्दबाजी में नीति को अंतिम रूप देने के बजाय सभी पहलुओं की पड़ताल करना चाहती है। अधिकारियों को विभिन्न विकल्पों पर काम करने के निर्देश दिए गए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर कुछ और बैठकें हो सकती हैं। इसके बाद ही फ्रीहोल्ड नीति में बदलाव या नई व्यवस्था को लेकर कोई ठोस प्रस्ताव सामने आएगा।

1977 में अलग हुआ था सदर क्षेत्र

अंबाला छावनी की जमीन से जुड़ा विवाद करीब पांच दशक पुराना है। 5 फरवरी 1977 तक पूरा क्षेत्र कैंटोनमेंट बोर्ड के अधीन था। तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसीलाल के कार्यकाल में 1063 एकड़ जमीन को कैंटोनमेंट से अलग कर नगर पालिका को सौंपा गया था। तत्कालीन व्यवस्था के तहत हरियाणा सरकार को भारत सरकार की जमीन का मालिकाना अधिकार मिलना था और इसके बदले सेना को 150 एकड़ जमीन मुफ्त उपलब्ध कराई जानी थी।

बाद में सेना को जमीन उपलब्ध कराकर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। इसके बावजूद कई मामलों में भवनों की रजिस्ट्री होने के बाद भी जमीन का स्वामित्व सरकार के नाम दर्ज रहा। यही स्थिति अब संपत्ति मालिकों के लिए सबसे बड़ी अड़चन बनी हुई है।

अब यह परेशानियां झेल रहे लोग

जमीन का मालिकाना स्पष्ट नहीं होने से हजारों परिवारों को रोजमर्रा के संपत्ति संबंधी कामों में परेशानी का सामना करना पड़ता है। बैंक से ऋण लेने, भवन का नक्शा पास कराने, संपत्ति के हस्तांतरण, खरीद-फरोख्त और उत्तराधिकार संबंधी मामलों में जमीन के स्पष्ट मालिकाना हक की जरूरत पड़ती है।

ऐसे में सरकार की मौजूदा कवायद केवल फ्रीहोल्ड शुल्क तय करने तक सीमित नहीं है। असल चुनौती यह है कि लंबे समय से चली आ रही इस स्वामित्व संबंधी उलझन का ऐसा समाधान निकले, जिससे वर्षों से रह रहे परिवारों को वास्तविक और स्थायी अधिकार मिल सके। अब आने वाली बैठकों पर नजर है कि इस में फ्रीहोल्ड पॉलिसी को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है।

विज जनता के साथ खड़े होकर लड़ने की कर चुके बात

बीते दिनों अंबाला कैंट के अग्रवाल धर्मशाला में भाजपा वर्करों की मीटिंग में भी विज ने यह मुद्दा उठाया था। इस दाैरान उन्होंने कहा था कि यदि जरूरत पड़ी तो जनता के साथ खड़े होकर इसके लिए लड़ाई लड़ेंगे। हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि जो गलत चीजें अफसरों ने पॉलिसी में जोड़ी हैं, उनको ठीक हो जाएंगी।