80 की उम्र में भी सेवा का जज्बा, 12 साल से ‘अपना घर’ के चूल्हे से गरीबों को हरी सब्जियां भिजवा रहीं अंबाला की दादी
अंबाला छावनी की 80 वर्षीय कृष्णा सागर पिछले 12 वर्षों से रेड क्रॉस के 'अपना घर' में निराश्रितों को नियमित ...और पढ़ें
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अंबाला छावनी की 80 वर्षीय कृष्णा सागर (फाइल फोटो)
HighLights
80 वर्षीय कृष्णा सागर 12 साल से कर रही हैं सेवा
'अपना घर' के निराश्रितों को नियमित ताज़ी सब्जियां देती हैं
त्योहारों पर उपहार देकर परिवार जैसा अहसास कराती हैं
उमेश भार्गव, अंबाला। किसी के घर में चूल्हा जलाने के लिए सब्जी खरीदना सामान्य बात है, लेकिन उन लोगों की रसोई का जिम्मा उठाना, जिनका अपना कोई घर-परिवार नहीं, संवेदना की मिसाल है। अंबाला छावनी की 80 वर्षीय कृष्णा सागर पिछले 12 वर्षों से यही कर रही हैं। रेडक्रॉस के ‘अपना घर’ में रहने वाले करीब 20 निराश्रितों की थाली में मौसमी हरी सब्जियां पहुंचें, इसके लिए वह अग्रसर रहती हैं।
पति लक्ष्मीसागर के निधन के बाद भी उन्होंने सेवा का यह सिलसिला टूटने नहीं दिया। उनके लिए यह दान नहीं, उन लोगों के प्रति जिम्मेदारी है, जिनके पास अपना कहने को कोई नहीं। कृष्णा सागर वर्ष 2000 से रेडक्रॉस से जुड़ी हुई हैं और इसकी कार्यकारी सदस्य हैं और अब उनका बेटा संजीव सागर अपने कारोबार के साथ अपनी मां के इस कार्य में सहयोग कर रहा है।
मौसम के साथ बदलती है सब्जियों की टोकरी
‘अपना घर’ में औसतन 16 से 20 निराश्रित रहते हैं। इन सभी के भोजन के लिए कृष्णा सागर आलू, प्याज, हरी मिर्च, घीया, तोरी, बैंगन, शिमला मिर्च, अरबी, करेला से लेकर कटहल और मौसम के अनुसार मिलने वाली दूसरी सब्जियां उपलब्ध करवाती हैं। यानी यहां की रसोई में मौसम के साथ सब्जियों का स्वाद भी बदलता रहता है।
उनकी मदद का महत्व केवल सब्जियां उपलब्ध करवाने तक सीमित नहीं है। भोजन की नियमित व्यवस्था से आश्रय गृह के प्रबंधन को राहत मिलती है और वहां रहने वाले लोगों को रोजमर्रा के खाने में ताजी सब्जियां मिल पाती हैं। जरूरत पड़ने पर कृष्णा सागर यहां रह रहे किसी मरीज के लिए दवाओं की व्यवस्था में भी मदद करती हैं।
त्योहार पर उपहार, ताकि किसी को अकेलापन न लगे
कृष्णा सागर के लिए सेवा का अर्थ सिर्फ पेट भरना नहीं, बल्कि लोगों को परिवार जैसा एहसास देना भी है। वह तीज-त्योहार भी अपना घर में रहने वाले लोगों के साथ मनाती हैं। इस दौरान उन्हें उपहार और जरूरत का सामान देकर खुशियां बांटती हैं।
जिन लोगों के पास अपना घर-परिवार नहीं है, उनके लिए त्योहार पर मिलने वाला यह अपनापन भी खास मायने रखता है। इस काम में उनकी सहेली सरला वालिया भी सहयोग करती हैं। वह भी आश्रय गृह में रहने वाले निराश्रितों के भोजन की व्यवस्था में मदद करती हैं। इनके अलावा रेनू खन्ना और निर्मल वर्मा भी जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध करवाने में योगदान दे रही हैं। रेनू खन्ना वर्ष 1978 से रेडक्रॉस की कल्याणकारी गतिविधियों से जुड़ी हुई हैं।
सेवा के लिए उम्र नहीं, संवेदना जरूरी
कृष्णा सागर की दिनचर्या बताती है कि समाज सेवा हमेशा बड़े आयोजन या मंच से ही नहीं होती। कई बार किसी की रसोई में नियमित रूप से सब्जी पहुंचाना, बीमारी में दवा का इंतजाम करना और त्योहार पर उसे उपहार देना भी किसी के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।
80 वर्ष की उम्र में भी कृष्णा सागर की यह निरंतरता उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो सेवा करना चाहते हैं, लेकिन शुरुआत के लिए किसी बड़े अवसर या साधन का इंतजार करते हैं। अपना घर में पहुंचने वाली सब्जियां केवल भोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि उस संवेदना की निशानी हैं, जो निराश्रितों को यह भरोसा दिलाती है कि समाज में उनकी परवाह करने वाले लोग आज भी मौजूद हैं।
