अहमदाबाद, शत्रुघ्न शर्मा। गुजरात के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला ने एक बार फिर राजनीतिक पलटी मारते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का दामन थाम लिया है। यह उनका सातवां राजनीतिक दल है। दलीय राजनीति में आने से इनकार करने वाले वाघेला अचानक देश में लोकतंत्र को खतरे में बताकर एनसीपी में शामिल हो गए। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने उन्हें सदस्यता पत्र देकर पार्टी में शामिल किया।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार व वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल ने मंगलवार को अहमदाबाद की द उम्मेद होटल में कहा कि एनसीपी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के खिलाफ देश भर में एक मजबूत ताकत संगठित कर रही है, उन्होंने साफ किया कि एनसीपी हमेशा यूपीए व कांग्रेस के साथ ही रहकर चुनाव लड़ेगी। महाराष्ट्र में 48 में से 44 सीट पर समझौते का दावा करते हुए पवार ने कहा कि देश में लोकतंत्र का गला घोटा जा रहा है। सीबीआइ, आरबीआइ, सीवीसी, ईडी, न्यायालय हर संवैधानिक संस्था को खत्म किया जा रहा है। पंवार ने कहा कि यूपीए-3 के लिए वे अपने संगठन को मजबूत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि गुजरात में एनसीपी व कांग्रेस के बीच गठबंधन की संभावना कम है, ऐसी सूरत में एनसीपी खुद को चुनाव से अलग भी कर सकती है। कांग्रेस व वाघेला के बीच राज्यसभा चुनाव के समय से चल रही अनबन के मुद्दे पर भी पंवार ने कहा कि वाघेला राष्ट्रीय स्तर पर एनसीपी के लिए काम करेंगे, उनके अनुभव का लाभ गुजरात में भी मिलेगा। पवार ने कहा कि गुजरात ने देश की आजादी में अहम योगदान दिया है, इसलिए अभी चुप बैठने का समय नहीं है। वाघेला को भी इसीलिए दलीय राजनीति में आने का आग्रह किया गया था। वाघेला को एनसीपी का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया है।

कभी राफेल मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पाक साफ बताने वाले पवार ने अब कीमत को लेकर केंद्र पर सवाल उठा दिया, हालांकि राफेल की तकनीक को लेकर पंवार केंद्र सरकार के साथ हैं लेकिन बोफोर्स की तरह संयुक्त संसदीय समिति को मामला सौंपने की मांग भी रख दी। महाराष्ट्र में अकाल के दौरान पशुओं के लिए गुजरात की सहकारी संस्थाओं की ओर से मदद के लिए पूर्व मंत्री एवं सागर डेयरी के प्रमुख विपुल चौधरी के खिलाफ आपराधिक मुकदमें पर आपत्ति जताते हुए पवार ने कहा कि महाराष्ट्र व गुजरात में फर्क नहीं है, आपत्ति में एक दूसरे की मदद करते आए हैं। अकाल राहत में मदद भेजने के लिए उन पर मुकदमा चलाने से राज्यों के बीच भाईचारा को खत्म करने वाला कदम होगा।

वरिष्ठ नेता वाघेला ने कहा कि देश में आज हालात ठीक नहीं हैं, लोकतंत्र खतरे में है, इसीलिए उन्हें अपना दलीय राजनीति में नहीं आने का फैसला बदलना पड़ा। पुत्र महेंद्र वाघेला के एनसीपी में शामिल होने के सवालों पर वाघेला ने कहा कि महेंद्र परिपक्व नेता हैं तथा अपना फैसला खुद लेने में सक्षम हैं। इसलिए उनका सवाल मेरे से नहीं पूछना चाहिए। गुजरात में चुनाव लड़ने का सवाल फिलहाल वाघेला टाल गए, लेकिन उनके साबरकांठा से चुनाव लड़ने की संभावना है। एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने कांग्रेस के साथ गठबंधन पर कहा कि वर्ष 2017 चला गया अब आगे की बात होनी चाहिए। यहां एनसीपी राजस्थान के अध्यक्ष उम्मेद सिंह चंपावत भी मौजूद थे।

राजनीतिक समीकरण
विधानसभा चुनाव की तरह गुजरात में वाघेला कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। उत्तर व मध्य गुजरात में वाघेला की अच्छी पकड़ मानी जाती है। कांग्रेस से गठबंधन की सूरत में वे दो सीट जिताने में सक्षम हैं, लेकिन गठबंधन नहीं होता है और एनसीपी अपने दम पर सभी सीटों पर चुनाव लड़ती है तो कांग्रेस को तीन से चार सीट पर इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है। राज्य की सभी 26 सीट पर हाल भाजपा का कब्जा है, लेकिन विधानसभा चुनाव में मिली 76 सीटों से उत्साहित कांग्रेस लोकसभा की आठ सीट पर जीत का दावा ठोक रही है।

जानें, कौन हैं वाघेला
21 जुलाई, 1940 को गांधीनगर के वासणिया गांव में जन्में शंकर सिंह वाघेला वर्ष 2004 से 2009 तक केंद्र में कपड़ा मंत्री रहे। प्यार से उन्हें लोग बापू कहते हैं। वर्ष 1995 में भाजपा ने 120 सीट के साथ चुनाव जीतकर केशुभाई पटेल के नेत्रत्व में सरकार बनाई, जिसे वाघेला ने गिरा दिया था। वरिष्ठ नेता सुरेश मेहता सीएम बने, लेकिन 1996 में वाघेला ने मेहता की सरकार को गिराकर खुद सीएम बन गए लेकिन एक साल बाद कांग्रेस के दबाव के चलते इस्तीफा देना पड़ा।

करीब 22 साल तक कांग्रेस में रहते हुए वाघेला केंद्र में मंत्री रहे, गुजरात में नेता विपक्ष चुने गए तथा 2002 में उन्हें कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया गया। 2017 में राज्यसभा चुनाव से पहले वाघेला ने एक बार फिर पलटी मारते हुए कांग्रेस से विदा ली। विधानसभा चुनाव में उन्होंने जनविकल्प मोर्चा बनाकर मैदान में उतरे लेकिन विफल रहे। वाघेला ने अपने सार्वजनिक कैरियर की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से की थी।

इसके बाद पहली बार जनसंघ से राजनीति की शुरुआत की। इसके बाद जनता दल, भाजपा,राजपा, कांग्रेस, जनविकल्प तथा अब राकांपा से अपनी नईपारी की शुरुआत की है। वे लंबे समय से भाजपा के खिलाफ महागठबंधन में शामिल होने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस के साथ उनकी अनबन के चलते महागठबंधन के दल उन्हें भाव नहीं दे रहे थे। आखिर एनसीपी के जरिए एक बार फिर वे दलीय राजनीति में उतर गए हैं।

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