अहमदबाद, जेएनएन। हिरासत में मौत के 30 साल पुराने मामले में सैशन कोर्ट की ओर से निलंबित आईपीएस संजीव भट्ट को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को चुनौती देने वाली याचिका को हाईकोर्ट ने संजीव भट्ट पर अविश्‍वास जताते हुए खारिज कर दी थी। संजीव भट्ट के अदालत के प्रति रवैए को भी हाईकोर्ट ने अपने फैसले का आधार बनाया है।

हाईकोर्ट की न्‍यायाधीश बेला त्रिवेदी की ओर से गत 25 सितंबर को पारित आदेश को गत सोमवार को ही हाईकोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया गया। इस आदेश में उल्लेख किया कि संजीव भट्ट को आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था। अभियुक्तों के निर्दोष होने के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। अदालत ने सरकारी वकील मितेश अमीन की कोर्ट में की गई दलीलों के साथ-साथ अदालती कार्रवाई के दौरान संजीव भट्ट के कोर्ट के प्रति रवैए पर भी गौर किया गया।

हाईकोर्ट ने माना कि संजीव भट्ट अदालतों के प्रति सम्‍मान भाव नहीं रखते हैं तथा उच्चतम न्‍यायालय में गंभीर टिप्‍पणियां की। अदालत ने यह भी कहा कि संजीव भट्ट ने कोर्ट को जान-बूझकर गुमराह करने का प्रयास किया, जबकि उनके तथ्‍य सच से काफी दूर थे।

बचाव पक्ष के वकील बीबी नायक ने हाईकोर्ट को बताया कि यह मामला 30 साल पुराना होने के साथ काफी पेचीदा भी है। वहीं, वादी की ओर से दिए गए सबूत व बयानों में काफी विरोधाभास है, जिससे संजीव भट्ट के दोषी होने की पुष्टि नहीं हो जाती है। हाईकोर्ट ने अब इन सभी दलीलों को दरकिनार करते हुए भट्ट को इस मामले में दोषी मानते हुए उनकी चाचिका को ही खारिज कर दिया। इस मामले में संजीव भट्ट के साथ पांच अन्‍यों को भी दोषी ठहराया गया था। गौरतलब है कि गुजरात सरकार ने लगातार ड्यूटी पर गैरहाजिर रहने के बाद 2015 को उन्‍हें निलंबित कर दिया था। 

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