अहमदाबाद, प्रेट्र। गुजरात हाईकोर्ट ने वैश्विक महामारी कोविड-19 के परीक्षण की अनुमति निजी क्षेत्र के अस्पतालों और लैब को नहीं देने पर राज्य की भाजपा सरकार की नीयत पर सवालिया निशान लगाया है। हाईकोर्ट का कहना है कि राज्य में कोरोना संक्रमण के मामलों में हेरफेर करने की गरज से यह सरकारी नियंत्रण किया जा रहा है।

जस्टिस जेबी परदीवाला और आइजे वोरा की खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देशित किया है कि वह सरकारी दरों पर अधिकतम टेस्टिंग किट मुहैया कराए। ताकि सरकारी और निजी अस्पताल अधिक से अधिक टेस्टिंग करके कोरोना के संक्रमण का पता लगा सकें। उन्होंने कहा कि यह दलील कि अधिक से अधिक टेस्टिंग से 70 फीसद आबादी कोरोना संक्रमण का शिकार हो सकती है। ऐसे में भय का भयावह माहौल पैदा होगा। कोर्ट ने कहा कि टेस्टिंग नहीं करने के लिए यह कोई वैध या वाजिब आधार नहीं है।

उन्होंने सरकार को निर्देशित किया कि प्रचार के सहारे लोगों के मन से भय मिटाएं। और जरूरत पड़े तो लोगों को घर में ही अलग-थलग रहने (होम आइसोलेशन) को कहें। कोर्ट ने कहा कि कोविड-19 के मरीजों के लिए टेस्टिंग अनिवार्य होनी चाहिए। चूंकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) की गाइडलाइंस के अनुसार मरीजों के परीक्षण से बचना नहीं चाहिए। फिर चाहे वह दो -तीन या उससे अधिक दिनों तक हल्के, मध्यम या बिना लक्षण वाला मरीज ही क्यों न हो। क्योंकि इतने कम समय में वैज्ञानिक आंकड़ों, शोध या कारणों को नहीं समझा जा सकता है।

हाईकोर्ट ने गुजरात सरकार से सवाल किया है कि पहले सरकार ने आरटी-पीसीटी टेस्ट करने की अनुमति दी लेकिन बाद में परीक्षण की इजाजत न देकर कहा कि इससे मामलों की तादाद बढ़ जाएगी। सरकार क्या राज्य में कोविड-19 के मामलों के आंकड़ों को अपने हिसाब से सीमित रखना चाहती है। इससे सवाल उठता है कि 12 निजी लैबों और 19 सरकारी लैबों में कोविड परीक्षण क्या पर्याप्त होगा।

Posted By: Sachin Kumar Mishra

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