मिर्जापुर

कलाकार : पंकज त्रिपाठी, श्वेता त्रिपाठी, अली फजल, विक्रांत मेसी, श्रिया पिलगांवकर, दिव्येंदू शर्मा

निर्देशक : गुरमीत सिंह

क्रियेटर्स : करन अंशुमन, पुनीत कृष्णा

एपिसोड : 9

स्टार : 3

अनुप्रिया वर्मा, मुंबई। मिर्जापुर के लेखकों और शो के क्रियेटर्स ने इस बात को पूरी तरह से पहले ही स्पष्ट कह दिया है कि इस वेब शो में मिर्जापुर के नाम का इस्तेमाल काल्पनिक तरीके से ही किया जा रहा है. शो के संदर्भ से मिर्जापुर की वास्तविक छवि या उस शहर की आवोहवा को आंकने की कोशिश न की जाये. मिर्जापुर का शो के संदर्भ में नामकरण सिर्फ कल्पना मात्र है. सो, इस लिहाज से मिर्जापुर की असल दुनिया का इस काल्पनिक मिर्जापुर से तुलना की आंखों से देखने पर जाहिर है मिर्जापुर के वासी निराश ही होंगे. सो, वास्तविकता के मिर्जापुर को देख चुके दर्शकों को उस चश्मे को उतार कर इसे देखा जाना ही उचित है. इसलिए, बात सिर्फ करण और उनके लेखकों की गढ़ी मिर्जापुर और उनके पात्रों की. 

बेशक मिर्जापुर वास्तविक दुनिया में कजरी के लिए जाना जाता है और इसके साथ सांस्कृतिक गतिविधियों वाला शहर माना जाता है. मगर, करण, पुनीत और गुरमीत के काल्पनिक मिर्जापुर में संस्कृति भी कालीन भईया की है और सभ्यता भी कालीन भईया की है और इस कालीन भईया के लिए उसका धंधा ही उसकी संस्कृति और सभ्यता है. ड्रग बेचना, बारुद और देसी कट्टा और वह भी कारपेट के अंदर यही उनका व्यवसायिक धर्म है.

करण इस वेब शो में एक ऐसी कहानी लेकर आये हैं, जहां बात बाद में की जाती है बंदूक पहले तानी जाती है. शो की सबसे बड़ी खासियत लेखनी की है. संवाद माहौल के मिजाज से बिल्कुल सटीक हैं. खासतौर से पंकज त्रिपाठी, जो कि शो में कालीन भईया के किरदार में हैं. उनकी दबंगई पर उनके लिये लिखे गये संवाद बिल्कुल सटीक बैठते हैं. शो की खूबी है कि शुरुआती के दो एपिसोड आपको सभी पात्रों से रूबरू कराते हैं और आप सभी के किरदारों की विशेषताओं को देखकर हैरान होते हैं.

शुरुआती एपिसोड में ही हम कालीन भईया की दबंगई का नजारा देख लेते हैं. कालीन दबंग हैं. लेकिन घर आकर वह एक चिंतित पिता हैं. क्योंकि उनका बेटा मुन्ना समझदार नहीं है और कालीन को लगता है कि वह उनके व्यवसाय को आगे बढ़ाने में निरर्थक होगा. मुन्ना में व्यवसाय के गुण नहीं, हुनर नहीं. लेकिन हर बिगड़े बाप की औलाद की तरह उन्हें अपने पिता की तरह ही राज करना. इसी बीच में कालीन को दो ऐसे लड़के मिलते हैं, जिसमें कालीन भईया के वे सारे गुण नजर आते हैं जो अपने बेटे में नहीं आते. यही से कहानी में काफी ट्विस्ट आते हैं. 

दो मासूम से दिखने वाले लड़के कैसे कालीन भईया पर ही राज करने लगते हैं. यह देखना दिलचस्प है. यह सच है कि कई जगह आपको अनुराग कश्यप के गैंग आॅफ वासेपुर की याद आ सकती है, क्योंकि मेकर्स ने खून खराबा दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है. परिवार, जाल-साजी, सत्ता का खेल, औलाद का मोह, दबंगई, गुंडागर्दी, सेक्स और इन सबके बीच श्रिया-अली और विक्रम श्वेता की लव स्टोरी भी दर्शायी गयी है. इस शो की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि शो के मेकर्स ने कलाकारों का चयन बिल्कुल पारखी नजर से किया है.

पंकज त्रिपाठी ने कालीन के किरदार में गैंगस्टर की भूमिका में ऐसे जंचे हैं, जो बंदूक चलाता है. खून खराबा फैलाता है. पूरे शहर में जिसका आतंक है. मगर चेहरे पर कोई शिकन नहीं. अब तक उनके निभाये किरदार में उन्हें इस किरदार से अभिनय में और एक्सटेंशन मिलता है. इस शो के सबसे बड़े सरप्राइज पैकेज हैं विक्रांत मेसी, जिन्हें अब तक कई फिल्मों में सेकेंड लीड किरदार अधिक निभाये हैं. इस शो के मेकर्स ने विक्रांत ने चौंकाया है. अब तक बेहद मासूम से दिखने वाले विक्रांत का बाहुबली किरदार प्रभावित करता है.

अली फजल को शो में बॉडी शॉडी दिखाने का पूरा मौका मिला है. उनका किरदार टुकड़ों में प्रभावित करता है. मगर कई दृश्यों में उनका अधिक उतावलापन बोर करता है. हालांकि अली और विक्रांत जब जब साथ दिखे हैं, दोनों की केमेस्ट्री काफी जंची है. गुडुडू की गन और बबलू का दिमाग दोनों मिल कर दर्शकों का मनोरंजन करने में कामयाब रहते हैं. वही दिव्येंदू शर्मा ने भी अपनी फिल्मों से इतर अलग तरह का किरदार निभाया है.

निराशाजनक यह है कि जहां शो की महिला किरदारों को दमदार इंट्रोडक्टरी दृश्य दिये गये थे, वह एपिसोड दर एपिसोड धुंधली पड़ती जाती है. श्वेता, रसिका, श्रिया के हिस्से अगर कुछ दमदार दृश्य आते तो महिला पात्रों के लिए इसे शायद एक मिसाल माना जाता. जैसे गैंग्स अॉफ वासेपुर की महिला पात्रों को अनुराग ने सशक्त रूप से गढ़ा था.

Posted By: Rahul soni