नई दिल्ली, मनोज वशिष्ठ। नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के छात्र रहे जाने-माने कलाकार अनूप सोनी ने छोटे और बड़े पर्दे पर अभिनय करते हुए दो दशक से अधिक हो चुके हैं। इस लम्बी अवधि में उन्होंने विभिन्न किरदारों से प्रभावित किया है। छोटे पर्दे पर अनूप सोनी क्राइम पेट्रोल जैसे सफल और लम्बा चलने वाले शो से बतौर होस्ट करीब 8 साल तक जुड़े रहे और बेतहाशा लोकप्रियता हासिल की। मगर, अब अनूप अब अभिनय पर फोकस कर रहे हैं।

अमेज़न प्राइम वीडियो की चर्चित वेब सीरीज़ 'तांडव' के बाद अब डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर 26 फरवरी को आ रही वॉर सीरीज़ '1962- द वॉर इन द हिल्स' में मेजर रंजीत खट्टर के किरदार में नज़र आएंगे। अनूप ने अपने किरदार, करियर और वेब सीरीज़ को लेकर भावी सम्भावनाओं और योजनाओं को लेकर जागरण डॉट कॉम के डिप्टी एडिटर मनोज वशिष्ठ से बातचीत की।

'1962- द वॉर इन द हिल्स' में अपने किरदार मेजर रंजीत खट्टर के बारे में बताइए। यह किस मिज़ाज का किरदार है?

मेजर रंजीत खट्टर इस जंग का एक अहम किरदार हैं। मेजर सूरज सिंह (अभय देओल) और मेजर रंजीत दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं। दोनों में बहुत नजदीकी रिश्ता है और दोनों में एक बड़ा हेल्दी कॉम्प्टिशन चलता है। जब यह बैटल होता है और लीड करने के लिए मेजर सूरज और उनकी कंपनी को चुना जाता है तो मेजर रंजीत थोड़ा निराश होते हैं। वो सोचते हैं कि मुझे यह मौक़ा क्यों नहीं मिल रहा? रंजीत की टीम बैकिंग में रहती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

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इस किरदार को निभाने के लिए आपने ज़हनी तौर पर क्या तैयारी की?

मुझे लगता है, मैं भाग्यशाली रहा हूं। मुझे वर्दी वाले रोल करियर की शुरुआत से मिलते रहे हैं। सी हॉक्स में मैंने कोस्ट गार्ड ऑफिसर का रोल प्ले किया था। कई शोज़ में पुलिस ऑफिसर रहा। वेब सीरीज़ टेस्ट केस में स्पेशल कमाडो ऑफ़िसर रहा था। ज़हनी तैयारी, किरदार की तैयारी होती। वर्दी वाले रोल में फिजिकल तैयारी मायने रखती है। बॉडी लैंग्वेज से लगे कि आप आर्मी ऑफिसर हैं। बहुत ज़रूरी एस्पेक्ट था। 1962 में प्रोडक्शन टीम ने अच्छा काम किया। उस दौर में जिस तरह के कपड़े होते थे, वैसे कपड़े हमें दिये। सबसे अहम था कि अपनी बॉडी लैंग्वेज से आर्मी ऑफिसर लगें।

साठ के दशक के किरदार को निभाने के लिए सामने क्या चुनौतियां थीं?

जब एक एक्टर अपने कैरेक्टर के कॉस्टयूम पहनता है तो एक फील आती है। जब कॉस्ट्यूम ट्राई किया तो एडजस्ट होने में टाइम लगा, क्योंकि पैंट उस ज़माने में अलग तरह की होती थीं। पैंट का एक हिस्सा काफ़ी ब्रॉड होता है। उस फैशन से हम लोग वाकिफ नहीं थे, क्योंकि उस समय पैदा भी नहीं हुए थे। ज़रूरी यह था कि इन कपड़ों को पहनने के बाद हमारी बॉडी लैंग्वैज बेढब नहीं लगनी चाहिए। यह ना लगे कि यह आदमी इन कपड़ों में अनकफर्टेबल है, क्योंकि उस ज़माने में वही फिटिंग चलती थी। उस दौर में पैंट हाई वेस्ट पहनी जाती थीं। हमारे कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर ने डिज़ाइन तो अच्छा किया था, लेकिन बतौर एक्टर हमारी ड्यूटी थी कि हम उन कपड़ों को पहनने के बाद ऐसे बर्ताव करें कि हमारे ही कपड़े हैं।

आर्मी ऑफ़िसर का किरदार निभाने के लिए फिजिकल फिटनेस पर कितना काम किया?

मैं नियमित रूप से वर्कआउट करने वाला इंसान हूं। मैं सिर्फ़ रोल के लिए बॉडी बनाने वालों में से नहीं हूं। 20-22 सालों से एक्सरसाइज कर रहा हूं। मेरे रूटीन में हमेशा दौड़ना-भागना और जिम जाना रहा है। मेरा एक अहम एक्शन सीक्वेंस है, जो हमने एक ही दिन में निपटा लिया था। एक्शन डारेक्टर डॉन ली के साथ बहुत मजा आया। मैं भी काफ़ी तैयार था। मुझे शॉट बताते थे। यहां बम फटेंगे। आपको उठकर गोली चलानी है। फिजिकली फिट होने की वजह से सब जल्दी हो जाता था। अच्छा लगता था कि डायरेक्टर खुश हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

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मेजर रंजीत सिंह का किरदार कैसे मिला और आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

एक दिन महेश जी और मेरी अचानक मुलाक़ात हुई थी। हम लोग अपने-अपने परिवार के साथ मिले थे। बातचीत चल रही थी कि उन्होंने कहा कि मैं एक सीरीज़ बना रहा हूं। एक रोल है। मुझे लगता है कि तुम फिट होओगे। कल मिलते हैं। मैंने जब रोल पढ़ा तो मैंने कहा कि इसमें कोई कॉन्फ्लिक्ट नहीं है। नाइस और स्वीट रोल है। उन्होंने कहा- नहीं अनूप तुम करो। उनके साथ कम्फर्टेबल था तो उन पर भरोसा था। जो मेरे कैरेक्टर की ज़रूरत है, महेश जी ने उसे पूरी अहमियत दी। बहुत बार ऐसी चीज़ें होती हैं कि किसी के साथ काम करना अच्छा लगता है और आप उसमें चले जाते हैं।

अभय देओल के साथ सीरीज़ में आप प्रतिस्पर्द्धा करते दिखेंगे। शूटिंग के दौरान भी अभिनय को लेकर ऐसी कोई प्रतिस्पर्द्धा थी क्या?

हर कलाकार कोई किरदार अपने हिसाब से करता है। अभय के साथ मेरे अधिक सींस हैं। अभय एक संजीदा एक्टर हैं। उन्होंने अच्छा काम किया है। एक अच्छा संतुलन रहा हमारे बीच। कोई कॉम्पटिशन नहीं था। अगर आप अपने किरदार की लाइन को फॉलो करते हुए चलेंगे तो कभी उस तरह के कॉम्पटीशन में नहीं पड़ेंगे। मुझे ऐसा लगता है कि जब एक सीन में दो किरदार होते हैं और एक किरदार बोल रहा है, दूसरा चुप है, तो जो चुप है तो उसे इस बात से घबराना नहीं चाहिए कि अरे मैं तो कुछ बोल नहीं रहा हूं। चुप रहने वाले को उस सीन में चुप रहना है और वो अपना काम ईमानदारी से करेगा तो वो ज़रूर नोटिस होगा। एक एक्टर के तौर पर मैं इस बात से बहुत सुरक्षित रहा हूं कि किरदार की लाइन को फॉलो करूं। दर्शक ज़रूर नोटिस करेंगे। 

1962 के भारत-चीन युद्ध पर क्लासिक फ़िल्म हकीकत बनी थी। और भी कई अहम वॉर फ़िल्में बन चुकी हैं। '1962- द वॉर इन द हिल्स' कैसे अलग है?

देखिए, फॉर्मेट अलग हो जाता है। फ़िल्म दो-सवा दो घंटे की होती है। यह एक सीरीज़ है। उन किरदारों की निजी ज़िंदगी के बारे में विस्तार से दिखा पाते हैं, क्योंकि टाइम स्पेस अधिक है। 

महेश मांजरेकर के साथ आपने हथियार फ़िल्म में काम किया था। एक निर्देशक के तौर पर उनमें क्या बदलाव देखते हैं?

मुझे लगता है, महेश जी मल्टीटैलेंटेड हैं। एक्टिंग अच्छी करते हैं। लिखते बहुत अच्छा हैं। बहुत कम लोगों को पता है कि वो क्रिकेट भी बहुत अच्छा खेलते हैं। उनकी क्रिकेट की जानकारी तगड़ी है। 15-16 साल पहले फ़िल्म की थी। फर्क इतना है कि वहां बड़ी स्टार कास्ट होती थी। बड़े सितारे थे। यहां वो सीरीज़ कर रहे हैं। उनका अनुभव भी बहुत ज़्यादा है। यहां वो ज़्यादा कम्फर्टेबल पोजिशन में थे कि अपने हिसाब से चीज़ें बना रहे थे।

आपने अभिनय की दुनिया में लम्बा सफ़र तय किया है। अपनी अभिनय यात्रा का आंकलन कैसे करेंगे? 

एक्टर के तौर पर मैं अभी बहुत भूखा हूं। मैंने काम बहुत काम किया है। सबकी परिस्थिति अलग होती है। मैंने क्राइम पेट्रोल किया, नहीं पता था इतना लम्बा चल जाएगा। अभी मैंने एक साल पहले छोड़ दिया। अभी मेरा सारा फोकस एक्टिंग एसाइनमेंट्स पर है। इसीलिए टेलीविज़न के बहुत सारे काम भी छोड़ दिये थे। टेलीविज़न और वेब सीरीज़ या फ़िल्मों की एक्टिंग में फर्क यह है कि टेलीविज़न पर एक किदार करते हैं तो बहुत लम्बे समय तक चलता है। एक्टर के तौर पर सीखने को ज़्यादा नहीं रहता। वेब सीरीज़ या फ़िल्मों में काम करते हैं तो आप नये-नये लोगों के साथ काम करते हैं। नये किरदार निभाते हैं। नया लुक होता है। वो एक्साइटमेंट मैं अब छोड़ना नहीं चाहता।

 

 

 

 

 

 

 

 

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वेब सीरीज़ के इस दौर में अपने लिए क्या संभावनाएं देखते हैं और उन्हें एक्सप्लोर करने की क्या तैयारियां हैं?

मुझे लगता है, अच्छा दौर है। विभिन्न आयामों को एक्सप्लोर कर सकते हैं। ऐसा दवाब नहीं है कि मार्केट में चलने वाला हीरो चाहिए। वेब सीरीज़ अपने कंटेंट से चलती है। एक्टर छोटा हो या बड़ा, उससे फर्क नहीं पड़ता। अगर कंटेंट अच्छा है और एक्टर अच्छा काम करता है तो नोटिस होता है। मेरी भी कोशिश यही है कि यह जो बदलाव आया है, उसे एक्सप्लोर करूं और अपने लिए अच्छी जगह बनाऊं।

कहते हैं, समाज और सिनेमा एक-दूसरे से प्रेरित होते हैं, मगर समाज की रिएलिटी अक्सर सिनेमा को मुश्किल में डाल देती है। पिछले कुछ वक़्त में यह संवेदनशीलता बढ़ी है। आपकी पिछली वेब सीरीज़ तांडव को लेकर विवाद हुआ। अभिनेता होने के नाते इस परिदृश्य को कैसे देखते हैं?

मुझे ऐसा लगता है, हर चीज़ को लेकर इतना सेंसिटिव और फ्रेजाइल होकर नहीं देखना चाहिए। क्योंकि, यह जो डिबेट है- समाज सिनेमा को प्रेरित करता है या सिनेमा समाज को। यहां सिनेमा से मेरा मतलब कला है। कला अपने आप में सशक्त मीडियम है। यह बहुत लम्बी डिबेट है। भाषा को ले लीजिए। 1962 के संवाद अब नहीं चलेंगे। उस वक़्त हिंदुस्तानी भाषा अधिक चलती थी। वो आज नहीं चलेगी। हमें छोटी-छोटी बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए। कला को कला की तरह लेना चाहिए। हम तो यही उम्मीद करेंगे कि ऐसा ना हो। आर्ट के साथ ऐसा ना हो। बाकी कुछ नहीं कर सकते। आर्ट हमेशा सॉफ्ट टारगेट बन जाती है।

ओटीटी कंटेंट को लेकर सरकार सख़्त होती दिख रही है। कंटेंट को सेल्फ़ रेग्यूलेट और सेंसरशिप करने की बातें की जा रही हैं। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

मुझे लगता है कि हर चीज़ को ऐसे बांध दोगे तो किसी भी क्रिएटिव आदमी के लिए बड़ा मुश्किल हो जाएगा। इसका मतलब यह है कि आप अपनी जनता की समझदारी पर विश्वास नहीं करते हो। मैं एक उदाहरण देता हूं। मुझसे लोग अक्सर कहते थे कि क्राइम शोज़ से लोगों को क्राइम करने की प्रेरणा मिलती है। मैं कहता था कि यह एक बहाना है। अगर कोई क्राइम शो देखकर प्रभावित होता है तो मैंने तो सारे क्राइम आठ नौ साल तक डिटेल में पढ़े हैं। मुझे सारी ट्रिक्स पता होना चाहिए। क्राइम शो बार-बार यही कहता है कि ज़िंदगी की कोई भी समस्या हो, क्राइम उसका हल नहीं हो सकता। लोग यह सीख क्यों नहीं लेते।

 

 

 

 

 

 

 

 

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दर्शक को इतना नादान ना समझें कि हर चीज़ को रेग्यूलेट कर दें। उन्हें पता है सही ग़लत क्या है। बनाने वाले भी अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। आप लोगों को सोचने-समझने का मौक़ा दीजिए। पूरे देश की जनता को बांध देना सही नहीं है। क्या देखना है, क्या नहीं, कोई और डिसाइड करेगा, यह सही नहीं है। टेलीविज़न में रेग्यूलेटरी बॉडी है, क्योंकि वो घर का मीडियम है। परिवार के साथ देखते हैं। वेब सीरीज़ मीडियम में यह बताया जाता है कि किसके लिए सूटेबल है, किसके लिए नहीं। सिनेमा में भी लिबर्टी है कि देखना है या नहीं देखना है। सोच की इतनी आज़ादी तो होनी चाहिए।

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