दीपेश पांडेय, जेएनएन। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन के सफर को दिखाती वेब सीरीज ‘मोदी- सीएम टू पीएम’ में महेश ठाकुर ने नरेंद्र मोदी का किरदार निभाया है। इरोस नाउ पर रिलीज हुई यह वेब सीरीज किशोर मकवाना की किताब ‘कॉमन मैन्स पीएम- नरेंद्र मोदी’ पर आधारित है तथा वेब सीरीज ‘मोदी- जर्नी ऑफ कॉमन मैन’ का दूसरा सीजन है। इसमें नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री से देश का प्रधानमंत्री बनने तक का सफर दिखाया गया है। महेश ठाकुर से बातचीत के अंश:

नरेंद्र मोदी के किरदार में सबसे चुनौतीपूर्ण क्या रहा? 

हम सभी ने मोदी जी को टीवी स्क्रीन या मंचों पर भाषण देते हुए देखा है। कैमरे के पीछे विभिन्न परिस्थितियों में उनका हाव-भाव कैसा होता है, उनके दिल में क्या चल रहा होता है, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। उनकी जिंदगी को समझना और कैमरे के सामने निभाना बड़ी चुनौती थी। मैं उनसे कभी मिला नहीं हूं। मैंने निर्देशक और लेखन टीम से विभिन्न परिस्थितियों में मोदी जी के स्वभाव और उनके हाव-भाव को समझने की कोशिश की। 

पहली बार इस प्रस्ताव के बारे में सुनकर क्या प्रतिक्रिया थी? 

मेरा पहला प्रश्न था कि यह कोई राजनीतिक प्रोजेक्ट है या क्रिएटिव प्रोजेक्ट? निर्माताओं ने बताया कि यह प्रोजेक्ट एक किताब पर आधारित है। जिसमें कुछ भी राजनीतिक नहीं, बल्कि यह पूरी तरह से क्रिएटिव प्रोजेक्ट है। मैं इसमें जी जान से जुट गया। निर्देशक उमेश शुक्ला ने मुङो भरोसा दिलाया कि आप सिर्फ मोदी जी की भावनाओं और हाव-भाव को समझने का प्रयास करें, बाकी लुक टीम संभाल लेगी। 

मोदी जी की किन विशेषताओं ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया? 

दिल में चल रही अंदरूनी जंग जीतकर ही मोदी जी अपने शासनकाल में इतने बड़े बदलाव लाने में सक्षम हुए हैं। यह एक बड़ी चुनौती है। उनकी सोच उन्हें दूसरों से अलग करती है। मोदी जी की तरह बतौर एक्टर मैं भी अपने लिए कोई किरदार नामुमकिन नहीं मानता हूं। बशर्ते किरदार में कुछ दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण चीजें दिखनी चाहिए। 

इस तरह के प्रोजेक्ट के बाद कलाकारों को अक्सर संबंधित विचारधारा से जोड़कर देखा जाने लगता है, इसका कोई डर था? 

मैं इस इंडस्ट्री में बीस-पच्चीस वर्ष से हूं। मैंने विविध किरदार निभाए हैं। मेरी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है। किरदार निभाना मेरा कर्म और पूजा है। अगर लोगों को मुङो किसी विचारधारा से जोड़ना है तो ये उनकी सोच है। मैं उसे नहीं बदल सकता हूं। 

किसी किरदार को निभाने के लिए उसकी विचाधारा में यकीन करना क्या जरूरी होता है? 

अगर कलाकार को किरदार की विचारधारा में यकीन हो तो किरदार को समझने में मदद मिलती है। कैमरे के सामने आप स्वयं को भूलकर वही किरदार बन जाते हो। किरदार के हाव-भाव स्वत: ही चेहरे पर आ जाते हैं। मैं मोदी जी का प्रशंसक हूं और उनकी विचारधारा में यकीन रखता हूं। 

करीब 25 वर्ष के कॅरियर में टीवी या फिल्मों में से किसी एक पर फोकस करने का प्रयास नहीं किया? 

फिल्मों में काम करने के लिए टीवी छोड़ना मुझे हास्यास्पद लगता है। टीवी, फिल्म, थिएटर या वेब सीरीज कहीं भी काम करने वाला अभिनेता ही होता है। मैंने हमेशा फिल्म और टीवी दोनों को कला दिखाने के मंच की तरह देखा है।

 

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