नई दिल्ली, प्रियंका सिंह। फिल्मों के सुपरस्टार जीशु सेनगुप्ता अब मुंबई शिफ्ट हो गए हैं। ‘मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी’, ‘बर्फी’ और ‘मर्दानी’ जैसी हिंदी फिल्मों में अभिनय कर चुके जीशु सेनगुप्ता का ध्यान अब बॉलीवुड की तरफ है। उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी कदम रख दिया है। वह जी5 की वेबसीरीज ‘स्काईफायर’ में खास किरदार में होंगे। उनसे हुई बातचीत के अंश...

सवाल: इस साल आपका झुकाव हिंदी सिनेमा की तरफ ज्यादा है...

जवाब : हां, मैं यहां शिफ्ट हो गया हूं। पहले बंगाल में साल में तीन-चार फिल्में करता था और यहां एक फिल्म करता था। अब यहां काम बढ़ा दिया है। अब केवल शूटिंग के लिए ही बंगाल जाता हूं। महेश मांजरेकर की फिल्म ‘देविदास ठाकुर’ की शूटिंग पूरी कर ली है। डबिंग बची है। फिल्म में विद्युत जामवाल के बड़े भाई का किरदार निभा रहा हूं। पारिवारिक कहानी है। सुजाय घोष के साथ एक शो पूरा किया है। एक और फिल्म है जिसमें अपने करियर का सबसे बड़ा किरदार निभाने वाला हूं, लेकिन उसके बारे में अभी बता नहीं सकता हूं।

सवाल: डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आना कैसे हुआ? ‘स्कायफायर’ कैसे मिली?

जवाब : इस वेबसीरीज का निर्देशन सौमिक सेन ने किया है। मैंने पिछले साल उनके साथ एक बंगाली फिल्म की थी। उस दौरान उन्होंने मुझे इसके बारे में बताया था। बाद में यह शो मुझे ऑफर होगा यह पता नहीं था। मैं मुंबई में शूटिंग कर रहा था। मुझे प्रोडक्शन हाउस से फोन आया। वहां पहुंचा तो सौमिक बैठ हुए थे। वही कहानी सुनाई गई जो पहले सौमिक ने सुनाई थी। मेरे किरदार का नाम धर्मा है, जो एक अच्छा इंसान है और लोगों की मदद करता है, किरदार में एक ट्विस्ट भी है।

सवाल : आप बंगाली और हिंदी दोनों सिनेमा में काम कर रहे हैं। कंटेंट को लेकर ज्यादा संतुष्टि कहां मिलती है?

जवाब : अच्छी फिल्में हर जगह बन रही हैं। संस्कृति और साहित्य के मामले में बंगाल हमेशा से ही समृद्ध रहा है। मैंने तेलुगू फिल्म में भी काम किया है। कंटेंट हर सिनेमा में अच्छा है। बस आपको अपने लिए सही स्क्रिप्ट चुननी पड़ती है।

सवाल : हिंदी सिनेमा और बंगाली सिनेमा में सबसे बड़ा अंतर क्या पाते हैं?

जवाब : बजट.. हमारी फिल्म का औसतन बजट ढाई से तीन करोड़ तक का होता है। जबकि हिंदी फिल्मों का औसतन बजट दस करोड़ तक का होता है। बंगाल में ढाई सौ सिनेमा हॉल होंगे। हर दर्शक को सिनेमा हॉल तक लाना संभव नहीं होता है। हम कोशिशों में लगे हैं। अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बंगाली फिल्में रिलीज हो रही हैं।

सवाल : बजट की वजह से क्या रचनात्मक फर्क पड़ता है?

जवाब : बिल्कुल पड़ता है। क्रिएटिविटी को बजट के मुताबिक ढालना पड़ता है। जो काम हमें चालिस दिन में करना चाहिए उसे हमें बीस दिन में खत्म करना पड़ता है। कम बजट में कैसे काम करना है उसके लिए सोचना पड़ता है। आपकी क्रिएटिविटी यहीं काम आती है।

सवाल : हिंदी और बंगाली स्क्रिप्ट का चुनाव करने की प्रक्रिया कितनी अलग होती है?

जवाब: फिल्म और गानों की कोई भाषा नहीं होती है। मैं भाषा नहीं, बल्कि फिल्म में अपना स्थान देखता हूं। भले ही एक ही सीन हो, लेकिन वहां मुझे अपना बेस्ट दिखाने का मौका मिलना चाहिए। कहने को तो मैं बंगाली फिल्मों का बड़ा एक्टर हूं, लेकिन मैंने वहां कि कई फिल्मों में गेस्ट अपीयरेंसेस किए हैं। बंगाली फिल्म ‘राजकाहिनी’ की हिंदी रीमेक ‘बेगम जान’ बनी थी। ‘राजकाहिनी’ बंगाल की बड़ी हिट फिल्म थी। उसमें मैंने वह किरदार निभाया था, जो ‘बेगम जान’ में चंकी पांडे ने निभाया था। वह मेरा पहला नेगेटिव किरदार था। मैं फिल्म के आखिरी दस मिनटों में था। फिर भी मुझे उस फिल्म के लिए कई बड़े अवॉर्ड्स मिले थे।

सवाल : दक्षिण भारतीय फिल्मों की तरह बंगाली फिल्मों का रीमेक उतना नहीं बनता है? क्या वजह मानते हैं?

जवाब : बंगाली और मलयालम फिल्मों की संस्कृति एक जैसी होती है। यह फिल्में ज्यादातर फिल्म फेस्टिवल्स में जाती हैं। यह सवाल यहां के निर्माता-निर्देशकों से होना चाहिए। मुझे लगता है, जो फिल्में बन चुकी हैं, उन्हें दोबारा रीमेक करने की बजाय नया कंटेंट बनाना चाहिए। हालांकि मैं रीमेक के खिलाफ बिल्कुल नहीं हूं।

 

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Posted By: Nazneen Ahmed

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