फिल्म- प्राग

कलाकार - चंदन रॉय सान्याल और एलेना कजान

निर्देशक-आशीष आर शुक्ला

अवधि-110 मिनट

कई स्तरों पर प्रयोगधर्मी कही जाने वाली 'प्राग' लंबे संघर्ष के बाद अब सिनेमाघरों में है। प्राग विशुद्ध तौर पर मल्टिप्लेक्स फिल्म है जो मल्टिप्लेक्स और व‌र्ल्ड सिनेमा के शौकीन लोगों को पसंद आ सकती है। यहां जिन मल्टिप्लेक्सों की बात हो रही है वे छोटे शहरों के मल्टिप्लेक्स नहीं है बल्कि वे मुंबई दिल्ली से भी ज्यादा बंगलौर, पुणे, एनसीआर, हैदराबाद और चेन्नई के मल्टिप्लेक्स हैं।

फिल्म में पटकथा कई स्तरों पर लिखी गई है। फिल्म की घटनाओं का एक दूसरे से संबंध नहीं है। फिल्म देखते हुए क्रिस्टियन बेल की 'द मशीनिस्ट' और 'पल्प फिक्शन' की याद आती है। फिल्म की कहानी मुंबई से ही जुड़ी है चंदन जो कि चंदन रॉय सान्याल निभा रहे हैं। उनको अपनी पढ़ाई के दौरान ही मिली एकफैलोशिप के जरिए प्राग जाना है। लेकिन अपने दोस्त की असामयिकमौत से जूझ रहे चंदन के लिए प्राग जाना और वहां का जीवन इतना आसान नहीं है। बुरी यादें उनके जीवन में बार-बार वापस आती हैं। और वहीं पर उनका सामना एलेना से होता है जो खुद एलेना कजान प्ले कर रही हैं। इन्हीं दोनों के प्यार की कहानी है प्राग। फिल्म में और भी कई परतें हैं जो दोस्ती, नफरत और जीवन की च्च्चाई की परतें सिरे से खोलती हैं।

चंदन रॉय सान्याल एक उम्दा अभिनेता हैं इसमें कोई शक नहीं है। पूरी फिल्म उन्हीं के कंधे पर है। ऐसे में फिल्म का एक संवाद आपके साथ बाहर निकल आने पर भी रह जाता है-'मैं पॉवर नहीं चाहता और मुझे क्यों चाहिए पॉवर।' एलेना फिल्म में एक रसियन लड़की के किरदार में हैं। उन्होंने अपना काम ढंग से और बेहतरी के साथ निभाया है। अगर चंदन को और मजबूत कहानी मिले तो शायद प्राग से बेहतर सोलो परफॉरमेंस देखने को मिले।

फिल्म की एक और महत्वपूर्ण बात इसका कैमरा है। जो लगातार मूविंग रहता है। मतलब किसी एक दृश्य पर आपकी निगाह नहीं टिक सकती। चेकोस्लोवाकिया शहर के बारे में निर्देशक आशीष आर शुक्ला ने बारीकी के साथ बताया है। कई बार जब चंदन और एलेना पार्क में बैठकर एक दूसरे को देख रहे होते हैं तो लगता है कि निर्मल वर्मा यहीं कहीं आस-पास प्राग में घूम रहे हैं। फिल्म के गानों में एक गीत जो प्रमोशन के तौर पर यूज किया गया था और लोगों के बीच चर्चित भी हुआ था। उसे फिल्म में कहीं भी दिखाया नहीं गया। कमल हसन और श्रीदेवी अभिनीत सदमा का वह गीत अगर फिल्म में होता तो दर्शकों को सुकून मिलता। चेक रिपब्लिक के भी कुछ गीतों को फिल्मकार ने उन्हीं बोलों के साथ फिल्म में डाला है जिसके अर्थ मर्मस्पर्शी हैं। निर्देशक आशीष आर शुक्ला की यह फिल्म इसलिए भी काबिल-ए-तारीफ है और सकारात्मक है कि लंबे समय से वे इसके थिएटर रिलीज की लड़ाई लड़ रहे हैं और कम से कम एक बात तो उन्होंने फिर से प्रूव की है अपने मन का काम करना मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं।

दुर्गेश सिंह

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