-पराग छापेकर

स्टारकास्ट: वरुण धवन, बनीता संधू, गीतांजलि राव आदि।

निर्माता- निर्देशक: शूजित सरकार

शूजित सरकार एक ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने हमेशा से ही लीक से हटकर फ़िल्में बनाने की कोशिश की है। ‘विकी डोनर’, ‘मद्रास कैफे’ या फिर ‘पिकू’ जैसी फ़िल्मों में देखें तो स्पष्ट है कि उनकी फ़िल्मों में सहजता एक स्वाभाविक किरदार होती है। शूजित की नई फ़िल्म ‘अक्टूबर’ इसी तरह सामान्य जीवन की एक कहानी है!

दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में डैन यानी दानिश (वरुण धवन) एक ट्रेनी है। शिवली (बनिता संधू) और मंजीत (साहिल वडोलिया) जैसे मित्र भी उसके साथ है! डैन अपनी ज़िंदगी में किसी काम को सीरियसली नहीं लेता मगर उसका सपना है कि वह एक रेस्तरां खोलेगा। सुबह होटल आना, काम पर लग जाना, आकर खाना खाकर सो जाना, सामान्य सी ज़िंदगी है! एक दिन एक दुर्घटना में शिवली घायल हो जाती है और कोमा में चली जाती है, उसके बाद उनकी लाइफ में क्या बदलाव आते हैं? इसी सामान्य सी कहानी का असामान्य प्रस्तुतीकरण है ‘अक्टूबर’।

स्लाइस ऑफ लाइफ वाली इस फ़िल्म में कहानी सिर्फ इतनी ही है मगर, जिस तरह से शुजित सरकार ने इसे सैल्यूलाइड पर ढाला है, यूं लगता है मानो आप एक सपना देख रहे हैं। 10 मिनट तक आपको लगता है कि फ़िल्म कहीं नहीं जा रही, फ़िल्म में कुछ भी नहीं हो रहा मगर धीरे-धीरे फ़िल्म आपको जकड़ना शुरू कर देती है और आपको पता ही नहीं चलता कब आप उनकी जीवन यात्रा में शामिल हो जाते हैं!

खूबसूरत संगीत, शानदार स्क्रीनप्ले और दृश्यों के गति और ताल को शूजित ने इस तरह संयोजित किया है कि बिना झटका खाए फ़िल्म आप पर सपने सी बीत जाती है। एक पारंपरिक भारतीय दर्शक की हैसियत से कहीं-कहीं भावपूर्ण संवादों की कमी महसूस होती रही मगर शुजित ने संवादों में भी रोजमर्रा के वाक्यों के अलावा कुछ नहीं रखा। जूही चतुर्वेदी ने बहुत ही सधा हुआ स्क्रीनप्ले लिखा है।

अभिनय की बात की जाए तो वरुण धवन एक अलग ही रंग में नज़र आते हैं। एक कमर्शियल हीरो के तौर पर सफल वरुण धवन का यह रंग दर्शकों के लिए वाकई चौंकाने वाला होगा। अपनी पहली ही फ़िल्म में शिवली बनी बनिता संधू अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। मां के किरदार में गीतांजलि राव की उपस्थिति फ़िल्म को मजबूती प्रदान करती है।

खूबसूरत सिनेमेटोग्राफी, सधी हुई एडिटिंग के साथ-साथ फ़िल्म के सबसे महत्वपूर्ण किरदार फ़िल्म के बैकग्राउंड स्कोर के लिए शांतनु मोइत्रा का उल्लेख बहुत जरूरी है। उनके म्यूजिक ने फ़िल्म को एक अलग स्तर पर पहुंचाया है। कुल मिलाकर ‘अक्टूबर’ सैल्यूलाइड पर उकेरा गया एक सामान्य आदमी का असामान्य स्वप्न है। एक ऐसी प्रेम कथा जो अभी तक हमने देखी नहीं है, प्रेम का एक अलग आयाम देखने के लिए आप ‘अक्टूबर’ देख सकते हैं। मगर दिमाग में वरुण धवन की ‘जुड़वां2’ ना जाए तो आप इस यात्रा का आनंद निश्चित ले सकते हैं।

जागरण डॉट कॉम रेटिंग: पांच (5) में से साढ़े तीन (3.5) स्टार

अवधि: 115 मिनट 

Video: फिल्म रिव्यु: ऑक्टोबर

Posted By: Hirendra J