- पराग छापेकर

मुख्य कलाकार: सैफ़ अली ख़ान, अक्षय ओबेरॉय, कुणाल रॉय कपूर, दीपक डोबरियाल, ईशा तलवार आदि।

निर्देशक: अक्षत वर्मा

निर्माता: सिनेस्तान फिल्म कंपनी प्राइवेट लिमिटेड

ब्लैक कॉमेडी हमारे यहां कम ही बनती हैं। लेकिन, ब्लैक कॉमेडी का ट्रीटमेंट भी उतना ही मायने रखता है, जितनी कमर्शियल फिल्म! पटकथा लेखक नवोदित निर्देशक अक्षत वर्मा की फिल्म 'कालाकांडी' एक ऐसी ही फिल्म है। सैफ़ अली ख़ान जैसे सितारे के साथ आई इस फिल्म को लेकर दर्शकों में काफी उत्सुकता थी!

फिल्म की कहानी तीन स्तर पर चलती है। फिल्म में मुंबई की एक रात की कहानी समाज के अलग-अलग वर्गों पर कैसे असर डालती है, यह कहने की कोशिश की गई है। एक तरफ रिलिन (सैफ अली खान) सीधे-सादे इंसान हैं।जिसने जीवन में किसी तरह का कोई नशा नहीं किया, कोई ऐसी हरकत नहीं की जिससे उसकी साख पर असर पड़े और ऐसे में एक दिन उसे अचानक मालूम होता है कि वह कैंसर से पीड़ित है और उसके पास कुछ ही दिन बचे हैं! ऐसे में वह जब घर पहुंचता है जहां उसके छोटे भाई अंगद (अक्षय ओबेरॉय) की शादी का फंक्शन चल रहा है। ज़िंदगी में पहली बार रिलिन नशा करता है और ड्रग्स लेता है।

छोटा भाई अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने के लिए किसी बहाने से होटल पहुंचता है और उसके गर्लफ्रेंड के पति के आ जाने के कारण वहां से भागकर बाहर आता है। दोनों भाई सड़कों पर भटक रहे हैं। इस बीच रिलिन को एक ट्रांसजेंडर मिल जाती है। कुणाल रॉय कपूर, शोभिता के प्यार को लेकर असमंजस में है जबकि वो उसे बहुत प्यार करता है। शोभिता पीएचडी करने अमेरिका जा रही है। इसी बीच यह दोनों अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में एक रेस्टोरेंट में पहुंचते हैं! जहां पर शराब के साथ-साथ ड्रग्स भी इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं और यहीं पुलिस की रेड पड़ती है।

तीसरी कहानी दीपक डोबरियाल और विजय राज की है। यह दोनों अंडरवर्ल्ड के पंटर है जिसका काम पैसे की उगाही करना है। फिरौती के करोड़ों रुपए को कैसे हजम किया जाए इसका प्लान बनाते-बनाते यह दोनों सड़कों पर भटक रहे हैं।

इन तीनों कहानियों का आपस में कैसे रिश्ता जुड़ता है और एक रात में समाज के अलग-अलग तबकों पर क्या फर्क पड़ता है यही दर्शाने की कोशिश इस फिल्म 'कालाकांडी' में की गई है।

अभिनय के स्तर पर बात की जाए तो यह फिल्म पूरी तरह से सैफ़ अली ख़ान की फिल्म है। उन्होंने बहुत ही शानदार परफॉर्मेंस दी है। उनका लुक भी काफी रोमांचक है! दीपक डोबरियाल भी अपने किरदार में छा जाते हैं। अक्षय ओबेरॉय एक कंफ्यूज प्रेमी की भूमिका में एकदम सटीक बैठे हैं।

अच्छाइयों के साथ-साथ इस फिल्म में जो खराबी नज़र आती है वो यह कि फिल्म का स्क्रीनप्ले बिखरा-बिखरा लगता है। कुछ सीन अनावश्यक रखे गए हैं। अलग-अलग किरदारों में सामंजस्य का अभाव मालूम पड़ता है। साथ ही कुछ दृश्य में हास्य को जबरदस्ती घुसाने की कोशिश की गई है। फिल्म में अंग्रेजी का इस्तेमाल काफी किया गया है इसलिए एक आम दर्शक के लिए इस फिल्म को समझना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।

क्लाइमेक्स में आपको एक अधूरापन लग सकता है! बहरहाल, बावजूद सारी कमियों के यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है।

जागरण डॉट कॉम रेटिंग: 5 में से (ढाई) स्टार

अवधि: 1 घंटे 52 मिनट

By Hirendra J