रामगोपाल वर्मा यानी रामू आजाद और सिर्फ अपने दिल की सुनने व मानने वाले फिल्मकार हैं। डार्क फिल्मों के समानार्थी हैं। उन्होंने क्राइम, अंडरव‌र्ल्ड, हॉरर और अलौकिक घटनाओं पर कई अच्छी फिल्में दी हैं। 'भूत रिट‌र्न्स' के साथ उन्होंने एक बार फिर हॉरर जॉनर को छुआ है। फिल्म के नाम से आप कतई यह न समझें कि यह उनकी 2003 में आई 'भूत' की सीक्वल या रीमेक है। वह फिल्म हिट तो रही ही थी, अजय देवगन और उर्मिला मांतोडकर को अवार्ड भी दिलवा गई थी। उसके सामने यह फिल्म कहीं नहीं टिकती। न डर, न कहानी और न ही अदाकारी में यह रामू की ही पिछली डरावनी फिल्मों 'फूंक', 'अज्ञात' और 'रात' के स्तर की है। वह भी फिल्म में 3डी यानी त्रिआयामी प्रभाव डालने के बावजूद। कई चीजों का दुहराव हुआ है। हॉलीवुड की 'मिरर्स' से तो एक सीन जस-का -तस लिया गया लगता है। डरावनी फिल्म में हास्य की गुंजाइश कम होती है, पर ढीली पटकथा के चलते फिल्म में जाने-अनजाने वैसे क्षण भी बन गए हैं।

तरूण (जेडी चक्रवर्ती) अपने परिवार के साथ एक आलीशान बंगले में शिफ्ट होता है, जो उसे काफी सस्ते में मिलता है। उसकी पत्‍‌नी नम्रता (मनीषा कोईराला) इस पर शक जाहिर करती है। इसका खुलासा जल्द हो जाता है, जब उनकी छह साल की बेटी निम्मी (अलायना) शब्बू का जिक्र करने लग जाती है। शब्बू किसी को नहीं दिखती, पर निम्मी उसके होने का अहसास बार-बार दिलाती है। सबको लगता है कि शब्बू, निम्मी का वहम है। जल्द तरूण की छोटी बहन पूजा(मधु शालिनी) उनके यहां आती है। वह निम्मी से शब्बू के बारे में बातें करती हैं। घर का नौकर लक्ष्मण बार-बार उनसे कहता है कि शब्बू कोई और नहीं आत्मा है। सबको घर से चले जाना चाहिए। सब उसकी बातों को नजरअंदाज कर देते हैं। इसके बाद हर रात उस घर में डरावनी आवाजें आने लगती हैं।

फिल्म को 3 डी में शूट किया गया है। इससे फिल्म में ज्यादा डर होने की गुंजाइश थी, लेकिन ऐसा होता नहीं। सच कहा जाए तो फिल्म का 3 डी प्रभाव प्रभावहीन है। सफल हॉरर फिल्मों की एंडिंग हैप्पी रखी जाती है। यहां रामू प्रयोग कर गए हैं। स्क्रीनप्ले दमदार नहीं है, जिसकी वजह से फिल्म टुकड़ों-टुकड़ों में डराती है। यह डरावनी और फनी फिल्म के बीच की कहानी है। संगीतकार संदीप चौटा का संगीत भी कुछ-कुछ जगहों पर ही फिल्म को पुनर्जीवित करता है। बाल कलाकार अलायना का मासूम चेहरा फिल्म की यूएसपी है। लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है, मगर डरावने सीन में वह असर पैदा करने और उसे यकीनी बनाने में असफल रही है। मनीषा कोईराला ने अपने अनुभव का पूरा इस्तेमाल किया है। उनकी अदाकारी अच्छी रही है। 'डिपार्टमेंट' में असरहीन रही मधु शालिनी ने इस फिल्म में अच्छी वापसी की है। उनकी अदाकारी प्रभावित करती है। जेडी चक्रवर्ती कमल हासन की कॉपी लगे हैं। 'शिवा' और 'सत्या' फेम इस कलाकार से उम्दा संवाद अदायगी की अपेक्षा थी। कुल मिलाकर कहें तो यह रामू की अब तक की सबसे कमजोर फिल्म है। फिल्म का क्लायमैक्स न पहेलीनुमा है और न ही डरावना। कुछ मौकों को छोड़ 'भूत रिट‌र्न्स' बड़ी मुश्किल से 'ओके' फिल्म है, जिसे सिनेमाघरों में विकल्प न होने की सूरत में रविवार की सुस्त दोपहरी या शुक्रवार की रात यादा से यादा एक बार देखी जा सकती है। यह फिल्म डराने की ख्वाहिशें तो जगाती है, मगर उन्हें पूरा करने से पहले ही उलटे पांव निकल लेती है।

निर्देशक- रामगोपाल वर्मा

कलाकार- मनीषा कोईराला, जेडी चक्रवर्ती, मधु शालिनी, अलायना

-दुर्गेश सिंह

**(दो स्टार)

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