-पराग छापेकर

स्टार कास्ट: अनुपम खेर, अन्नू कपूर, मनीष पॉल, मंजरी फडनीस, के के मेनन आदि। 

निर्देशक: विश्वास पांड्या

कुछ फ़िल्में मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं तो कुछ फ़िल्में संदेशप्रधान होती हैं! कुछ में कलात्मक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है तो कुछ फ़िल्में बे सिर-पैर की होती हैं! ऐसी ही फ़िल्म है- ‘बा बा ब्लैक शीप’। यह फ़िल्म क्यों बनाई गयी? इसका मकसद क्या था? फ़िल्म कहां से शुरू होती है और फिर उसका अंत कहां होता है? आखिर इस फ़िल्म में चल क्या रहा है? यह सब कुछ समझ से परे है!

फ़िल्ममेकिंग के हर मोर्चे पर बुरी तरह असफल रहने वाली इस फ़िल्म की कहानी गोवा में रह रहे बाबा (मनीष पॉल) की कहानी है, जिसके पिता चार्ली (अनुपम खेर) एक दुकान चलाते हैं और जो अपनी पत्नी के डर से घर के बर्तन धोने से लेकर स्वेटर बुनने जैसे सारे काम करते हैं। लेकिन, कहानी में ट्विस्ट यह है कि यह डरा-सहमा सा रहने वाला चार्ली दरअसल एक कॉन्ट्रैक्ट किलर है और जिसका परिवार बारह पुश्तों से पैसे लेकर लोगों की जान लेता आया है। बाबा को भी न चाहते हुए इस पारिवारिक धंधे में शामिल होना पड़ता है और उसके बाद हम देखते हैं कि कैसे उसका इस्तेमाल किया जाता है और कैसे वो मुश्किलों में घिरने लगता है!

बहरहाल, इस ट्रैक के साथ कहानी के दूसरे हिस्से में एक फ्रॉड ब्रायन मोरिस की भूमिका में अन्नू कपूर भी हैं। जिसकी बेटी ऐंजिलीना (मंजरी फडनीस) से बाबा प्यार करता है और उससे शादी करना चाहता है, मगर एक मोड़ पर चार्ली और मोरिस का भी टकराव होता है। के के मेनन भी इन सबके बीच एक ईमानदार पुलिस वाले के रूप में बाबा के साथ खड़े दिखते हैं! लेकिन, यह सब आपस में ऐसे उलझे हुए हैं कि यह कहानी आपको कन्फ्यूज़ कर देती है!

बड़ा सवाल है कि अन्नू कपूर और अनुपम खेर जैसे मंझे हुए कलाकार इस तरह की फ़िल्में क्या पैसों के लिए कर लेते हैं? अगर ऐसा है तो इस तरह की फ़िल्मों से उनकी ब्रैंड वैल्यू कम होती है। उन्हें इस तरह की फ़िल्में करने से बचना चाहिए।

मनीष पॉल ने थोड़ी कोशिश की है लेकिन, जब कहानी और स्क्रीनप्ले ही नहीं निर्देशन भी कमजोर हो तो कोई अभिनेता भला क्या कर लेगा? अगर आप इस फ़िल्म को देखने की सोच रहे हैं तो यह फ़िल्म आपको पूरी तरह से निराश करने वाली है!

जागरण डॉट कॉम रेटिंग: पांच (5) में से शून्य (0) स्टार

अवधि: 71 मिनट

By Hirendra J