नई दिल्ली (मनोज वशिष्ठ)। कोरोना काल में सिनेमाघरों की तालाबंदी और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती लोकप्रियता के शोर-शराबे के बीच शूजित सरकार निर्देशित 'गुलाबो सिताबो' अमेज़न प्राइम वीडियो पर 200 देशों में 15 भाषाओं के सबटाइटल्स के साथ रिलीज़ हो गयी। 

'गुलाबो सिताबो' भारतीय सिनेमा में इस बात के लिए तो याद की जाएगी कि थिएटर्स को गच्चा देकर सीधे मोबाइल स्क्रीन पर पहुंचने वाली यह पहली फ़िल्म है। मगर, अमिताभ बच्चन की बेहतरीन अदाकारी के बावजूद उनकी 'मास्टरपीस' फ़िल्मों की लिस्ट में शामिल नहीं हो पाएगी।

मकान मालिक और किराएदार के बीच 'टॉम एंड जैरी' वाले रिश्ते की कहानियां छोटे शहर-कस्बों में ख़ूब सुनने को मिलती हैं। शूजित के लिए 'विक्की डोनर' से लेकर 'अक्टूबर' तक लिखने वाली राइटर जूही चतुर्वेदी ने इसी रिश्ते को इस बार कहानी का केंद्र बनाया है। 

स्टोरी-स्क्रीनप्ले

फ़िल्म की कहानी 78 साल के लालची, झगड़ालू, कंजूस और चिड़चिड़े स्वभाव के मिर्ज़ा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी जान जर्जर हो चुकी हवेली में बसती है। हवेली मिर्ज़ा की बीवी फातिमा की पुश्तैनी जायदाद है। इसीलिए इसका नाम फातिमा महल है। मिर्ज़ा लालची ही नहीं काइयां भी है। पैसों के लिए हवेली की पुरानी चीज़ों को चोरी से बेचता रहता है। उसे ख़ुद से 17 साल बड़ी फातिमा के मरने का इंतज़ार है ताकि हवेली उसे मिल सके।

सालों पुरानी 'गिराऊ' हवेली में कई किराएदार रहते हैं, जिनमें से एक बांके रस्तोगी है। बांके हवेली में अपनी मां और तीन बहनों के साथ रहता है। छठी तक पढ़ा है और आटा चक्की की दुकान चलाता है। बांके एक लड़की से प्यार करता है, जो शादी के लिए दबाव बना रही है।

मिर्ज़ा, बांके को बिल्कुल पसंद नहीं करता। उसे परेशान करने के नए-नए तरीके ढूंढता है और हवेली से बेदखल करना चाहता है। जूही चतुर्वेदी ने स्क्रीनप्ले का बड़ा हिस्सा इन दोनों की खींचतान पर ख़र्च किया है। मगर, एक वक़्त के बाद यह खींचतान नीरस और उबाऊ लगने लगती है। फ़िल्म कहीं जाती हुई महसूस नहीं होती। कहानी में मोड़ और गति तब आती है, जब मिर्ज़ा एक वकील के साथ मिलकर बिल्डर को हवेली बेचने की तैयारी कर लेता है।

उधर, बांके एलआईजी फ्लैट के लालच में आर्कियोलॉजी विभाग के एक अधिकारी से मिलकर इसे पुरातत्व विभाग को सौंपने की योजना बना लेता है। मगर, बेगम का एक मास्टर स्ट्रोक मिर्ज़ा और बांके की योजनाओं पर पानी फेर देता है और दोनों को ही हवेली से निकलना पड़ता है, जिसके लिए दोनों एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए थे।

एक्टिंग

अमिताभ बच्चन को मिर्ज़ा बनाने के लिए उनकी नाक प्रोस्थेटिक मेकअप से लम्बी कर दी गयी है। ढीला कुर्ता और पजामा पहनाया गया है। सिर पर गोल टोपी और आंखों पर मोटे लैंस का चश्मा चढ़ा दिया गया है। 78 साल के मिर्ज़ा के किरदार के लिए अमिताभ कमर झुकाकर चलते हैं। आवाज़ के साथ भी प्रयोग किया है। 

सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ के लिए ऐसे किरदार निभाना चुनौती नहीं है। चुनौती तो लेखक और निर्देशक के सामने होती है। ऐसा लगता है, शूजित इस बार इस चुनौती को ठीक से संभाल नहीं सके। सही गेटअप, मेकअप और सटीक शारीरिक हाव-भाव के बावजूद मिर्ज़ा का किरदार 'पीकू' के भास्कर बनर्जी की तरह गुदगुदाता नहीं।  

वहीं निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के बांके का किरदार निभाने के लिए आयुष्मान खुराना ने मैले-गुजले कपड़े पहने हैं। थोड़ा पेट निकाला है। आयुष्मान ने अपने उच्चारण को भी बदला है। अपने किरदार में वो काफ़ी नेचुरल लगे हैं। यह अमिताभ और आयुष्मान की नपी-तुली अदाकारी ही है, जिसने कई दृश्यों को ढेर होने से बचा लिया है। सहयोगी कलाकारों में सृष्टि श्रावास्तव, विजय राज़ और बृजेंद्र काला अपने-अपने किरदारों में फिट नज़र आते हैं।

सिनेमैटोग्राफी, संगीत

फ़िल्म की कहानी में चमचमाते लखनऊ की कोई जगह नहीं थी, लिहाज़ा सिनेमैटोग्राफर अविक मुखोपाध्याय ने लखनऊ के पुराने हिस्सों को बेहतरीन ढंग से कैमरे में कैद किया है। जर्जर हवेलियों में नवाबी ठाठ की निशानियों को उभारा है। शांतनु मोइत्रा का बैकग्राउंड स्कोर साधारण है, मगर हवेली और मिर्ज़ा के दृश्यों में नेपथ्य में बजने वाला संगीत और गीत माहौल के अनुसार ही हैं। अच्छी बात यह है कि बिना ज़रूरत लिप सिंक वाले गानों की परम्परा अब हिंदी सिनेमा में कम हो रही है।   

निर्देशन

'पीकू' में अमिताभ बच्चन और 'विक्की डोनर' में आयुष्मान खुराना को अलग-अलग निर्देशित करने वाले शूजित 'गुलाबो सिताबो' में डगमगा गये। अच्छे अभिनय और तकनीकी पक्ष के बावजूद गुलाबो सिताबो एक मुकम्मल फ़िल्म नहीं लगती। इस फ़िल्म को देखने के दौरान बार-बार शूजित की ही फ़िल्में 'विक्की डोनर' और 'पीकू' ज़हन में दस्तक देती रहती हैं, जिनके हर एक फ्रेम में ह्यूमर की रवानगी थी। गुलाबो सिताबो उसके मुकाबले कमज़ोर साबित हुई है।

'गुलाबो सिताबो' के क्लाइमैक्स का आख़िरी दृश्य दरअसल इस फ़िल्म की समीक्षा ख़ुद ही कर देता है। आख़िरी सीन में दिखाया जाता है कि मिर्ज़ा हवेली से मिली जिस एंटीक कुर्सी को ढाई सौ रुपये में बेच देता है, शो रूम में उसी कुर्सी पर 1 लाख 35 हज़ार रुपये का टैग लगाकर बेचने के लिए रखा जाता है।

संदेश साफ़ है, हक़दार वही बनता है, जिसे उस चीज़ की क़ीमत का अंदाज़ा हो। फ़िल्म ख़त्म होने के बाद ज़हन में यही आता है कि अमिताभ उसी 'एंटीक कुर्सी' की तरह हैं, जो बेशकीमती है और शूजित सरकार नासमझ 'मिर्ज़ा' की तरह, जिसने उस लखटकिया कुर्सी को कौड़ियों के मोल बेच दिया।

कलाकार- अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, फारूक जफर, विजय राज़, बृजेंद्र काला, सृष्टि श्रीवास्तव आदि।

निर्देशक- शूजित सरकार

निर्माता- रॉनी लाहिड़ी, शील कुमार

वर्डिक्ट- **1/2 (ढाई स्टार)

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Posted By: Manoj Vashisth

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