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Ginny Weds Sunny 2 Review: इंटरवल के बाद फिल्म की निकली जान, कमजोर कहानी के बोझ तले दबी सफल फ्रेंचाइजी

By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
Published: Fri, 24 Apr 2026 03:53 PM (IST)

गिन्नी वेड्स सनी की फ्रेंचाइजी आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है, जिसमें इस बार अविनाश तिवारी और 12th फेल ...और पढ़ें

गिन्नी वेड्स सनी मूवी रिव्यू/ फोटो- Instagram

गिन्नी वेड्स सनी मूवी रिव्यू/ फोटो- Instagram

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संक्षेप में पढ़ें

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। साल 2020 में आई विक्रांत मैसी और यामी गौतम अभिनीत फिल्म 'गिन्नी वेड्स सनी' की फ्रेंचाइजी को निर्माता विनोद बच्चन ने आगे बढ़ाया है। हालांकि, इसका मूल फिल्म से कोई लेना-देना नहीं है। इस बार भी कहानी का केंद्र विवाह और उससे जुड़े सामाजिक मुद्दे ही हैं। हालांकि, ये मुद्दे बहुत प्रासंगिक नहीं बन पाए हैं और यही वजह है कि फिल्म अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहती है।

ऋषिकेश के रहने वाले सनी की कहानी

कहानी ऋषिकेश के रहने वाले सनी (अविनाश तिवारी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो कुश्ती में नेशनल चैंपियन बनने का सपना देखता है, लेकिन, झूठे छेड़छाड़ के आरोप और 'अय्याश पहलवान' के तौर पर वायरल हुए एक वीडियो के कारण उसका करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है। कहानी पांच साल आगे बढ़ती है। पिता राम सेवक (सुधीर पांडेय) उसकी शादी को लेकर परेशान हैं, जबकि मां का स्वर्गवास हो चुका है। किरायेदार रुद्र नारायण (रोहित चौधरी) से इंटर फेल सनी की गहरी दोस्ती है।

सनी अब अपनी दुकान चलाता है। अखबार में शादी का विज्ञापन देने के बाद दिल्ली से गिन्नी (मेधा शंकर) की शादी का प्रस्ताव उनके पास आता है। गिन्नी पढ़ी-लिखी और आजाद ख्याल की लड़की है, जिसकी पहले एक सगाई टूट चुकी है। पहली ही मुलाकात में उनकी शादी तय हो जाती है। हालांकि, दोनों अपनी-अपनी सच्चाई छुपा जाते हैं। शादी के बाद दोनों के बीच छुपी सच्चाइयों और अलग सोच के कारण दूरियां बढ़ने लगती हैं, जो धीरे-धीरे तलाक तक पहुंच जाती हैं।

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avinash tiwati

कई जगहों पर निर्देशक के हाथ से फिसली फिल्म

प्रशांत झा द्वारा लिखित और निर्देशित इस कहानी में कोई नयापन नहीं है। फिल्म के जरिए उन्होंने पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा लड़कियों के प्रति समाज की रूढ़िवादी सोच को उठाने का प्रयास किया है। सनी को गिन्नी का अंग्रेजी में बात करना और रिश्ते में अधिक खुलापन दिखाना खटकता है, लेकिन निर्देशक इस मुद्दे को तार्किक और प्रभावी रूप से पर्दे पर उठा नहीं पाए हैं। कहानी कई जगह अविश्वसनीय लगती है। खासकर आज के इस डिजिटल दौर में बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के शादी तय हो जाना हजम नहीं होता।

इंटरवल के बाद तो फिल्म की कहानी पूरी तरह लड़खड़ा जाती है। कहानी अपने मूल विषय से भटकती हुई और नीरस लगने लगती है। फिल्म में सनी और गिन्नी का रोमांस भी दिलचस्प नहीं बन पाया है। हालांकि, बीच-बीच में कुछ कॉमेडी के पल थोड़ी राहत जरूर लाते हैं, लेकिन कहानी अंत तक दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखने में संघर्ष करती है। फिल्म में भावनात्मक गहराई की कमी साफ झलकती है। "पढ़ी-लिखी जॉब करने वाली लड़की का हमें क्या करना है, हमें घर चलाना है कोई कोचिंग सेंटर नहीं" और "जिनकी शादी नहीं होती, वो ऐसे ही इरिटेटिंग हो जाते हैं" जैसे संवाद कहानी को कोई धार नहीं देते।

medha shankar

विजुअली फिल्म सुंदर लगती है। सिनेमेटोग्राफर अर्चित पटेल की तारीफ बनती है; उन्होंने ऋषिकेश की प्राकृतिक खूबसूरती को बखूबी कैमरे में कैद किया है। फिल्म का गीत-संगीत औसत दर्जे का है।

'12th फेल' वाला असर नहीं छोड़ पाईं मेधा शंकर

सनी की भूमिका में अविनाश तिवारी कुछ रोमांटिक सीन्स में कमजोर नजर आते हैं। ब्लॉकबस्टर फिल्म '12th फेल' की रिलीज के करीब ढाई साल बाद मेधा शंकर इस फिल्म में नजर आई हैं। वह पर्दे पर मासूम तो लगी हैं, लेकिन उन्हें अपने भावनात्मक दृश्यों पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

दोस्त की भूमिका में रोहित चौधरी का अभिनय उल्लेखनीय है, वह अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहते हैं। लिलेट दुबे और सुधीर पांडेय जैसे मंझे हुए कलाकार अपनी मौजूदगी से कहानी को संभालने का भरपूर प्रयास करते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा उनके प्रयासों के आड़े आ जाती है। कुल मिलाकर, कमजोर लेखन और नीरस आइडिया की वजह से यह फिल्म दर्शकों पर प्रभाव छोड़ने में असफल रहती है।

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