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Bandar Review: लड़कियों को मैसेज करने से पहले सोचेंगे आप, बॉबी देओल की दमदार परफॉर्मेंस; कहां चूकी फिल्म?

By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
Published: Fri, 05 Jun 2026 12:10 PM (IST)

बॉबी देओल और सान्या मल्होत्रा स्टारर फिल्म 'बंदर' सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। अनुराग कश्यप ने इस फिल्म में ...और पढ़ें

बॉबी देओल 'बंदर' मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

बॉबी देओल 'बंदर' मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

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संक्षेप में पढ़ें

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। मीटू आंदोलन, झूठे आरोपों की बहस और भारतीय जेलों की अमानवीय परिस्थितियां फिल्म ‘बंदर’ का मूल विषय हैं। फिल्म न्याय और पूर्वाग्रह के बीच की महीन रेखा को टटोलने की कोशिश करती है।

50 साल के समर की कहानी है 'बंदर'

कहानी सेलिब्रिटी समर मेहरा (बॉबी देओल) की है। 50 वर्षीय समर अविवाहित है। टीवी धारावाहिकों की वजह से उसकी पहचान है। अचानक से मुंबई पुलिस उसे गिरफ्तार करके ले जाती है। पता चलता है कि गायत्री आनंद (सपना पब्‍बी) ने उस पर बलात्‍कार का आरोप लगाया होता है। समर बार बार खुद को निर्दोष बताता है। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी की परतें खुलती हैं। दोनों एक डेटिंग एप के जरिए मिले होते हैं। समर अपनी बहन सुहानी मेहरा (सान्‍या मल्‍होत्रा) की मदद से वकील करता है। रिश्ता टूटने से आहत गायत्री समर पर बलात्कार का आरोप लगा देती है। स्थिति और खराब इसलिए हो जाती है क्योंकि समर उस रिश्ते के दौरान लगभग बेपरवाह रहा होता है।

उसे वे महत्वपूर्ण बातें याद नहीं रहतीं जो उसके बचाव में काम आ सकती थीं। जेल में समर को शारीरिक ही नहीं मानसिक प्रताड़ना भी झेलनी होती है। जेल के अंदर कैदियों में भी गुटबाजी होती है। लिजो (इंद्रजीत सुकुमारन) समर की बैरक के एक गुट पर नियंत्रण रखता है, जबकि बिलाल (अंकुश गेडम) और आतिश (सुकांत गोयल) दूसरे हिस्से पर। समर की जिंदगी इन हालातों से किस प्रकार जूझती है, यही फिल्म का मुख्य कथानक है।

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मीटू आंदोलन पर टिप्पणी हैं फिल्म

पिछले साल प्रतिष्ठित टोरंटो फिल्‍म फेस्टिवल में प्रदर्शित बंदर 'मीटू आंदोलन' पर टिप्‍पणी करती है। निखिल द्विवेदी निर्मित और सुदीप शर्मा और अभिषेक शर्मा की लिखी कहानी कानून के दुरुपयोग को रेखांकित करती है। फिल्‍म दिखाती है कि जेल में बंद तमाम संगीन अपराधी भी दुष्‍कर्मियों के प्रति किस प्रकार दुराग्रह रखते हैं। एक जगह एक कैदी कहता भी है कि दिल्‍ली के दुष्‍कर्मियों को कैदियों ने पीटा था। यह निर्भया कांड की याद दिलाता है। इसके साथ ही फिल्‍म भ्रष्‍ट पुलिस, जेल की भयावह परिस्थितियों मसलन गंदे बाथरुम, बैरक में क्षमता से अधिक कैदी, आदि को भी बारीकी से दिखाती है।

जेल के दृश्य भावनात्मक रूप से असर डालते हैं। हालांकि दूसरे भाग में फिल्म अपनी पकड़ कुछ हद तक खो देती है, जहां इसकी गति धीमी पड़ जाती है और कहानी थोड़ी खिंची हुई महसूस होती है। यह बात समझ नहीं आती कि समर का वकील क्‍यों उससे अकेले में जेल में नहीं मिल पाता है? चैट पर सिर्फ समर की बातचीत का ही जिक्र होता है उसमें गायत्री की सहमति क्‍यों नहीं दिखती? ऐसे कई सवाल अनुत्‍तरित हैं।

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तकनीकी पक्ष में प्रशांत बिडकर का प्रोडक्शन डिजाइन और विवेक केरकर का कला निर्देशन जेल की तंग और अमानवीय परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं। सिनेमेटोग्राफर शाज रिजवी ने यथार्थवादी माहौल को प्रभावशाली ढंग से कैद किया है। अधिकांश हिस्सों में संपादन चुस्त और सधा हुआ है, जबकि बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के तनाव को और अधिक प्रभावशाली बना देता है।

बॉबी देओल ने उठाया कंधों पर भार

कलाकारों में अभिनेता बॉबी देओल के कंधों पर इस फिल्‍म का पूरा भार है। उन्‍होंने जेल के अंदर की राजनीति और बाहर के भ्रष्टाचार के कारण धीरे-धीरे मानसिक संतुलन खोने की कगार पर पहुंच समर की मनोदशा को समुचित तरीके से व्‍यक्‍त किया है। भाई की मदद के लिए खड़ी बहन की भूमिका में सान्‍या मल्‍होत्रा प्रभाव छोड़ती हैं। गायत्री की भूमिका में सपना पब्‍बी का अभिनय सराहनीय है। पुलिसकर्मियों की भूमिका में जितेंद्र जोशी, नागेश भोसले संक्षिप्‍त भूमिका में अपना प्रभाव छोड़ जाते हैं। जेल के दबंग सरगना लिजो की भूमिका में इंद्रजीत सुकुमारन का अभिनय सराहनीय है।

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