फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ की सफलता से सैफ अली खान भी काफी खुश हैं और इसकी वजह हैं निर्देशक कबीर खान। दरअसल, हुसैन जैदी की किताब ‘मुंबई एवेंजर्स’ पर आधारित सैफ अली खान की नई फिल्म ‘फैंटम’ का निर्देशन भी कबीर खान ने ही किया है। फिल्म और जीवन के बाकी पहलुओं को लेकर सैफ ने स्मिता श्रीवास्तव से की बेबाक बातचीत...

‘फैंटम’ के ट्रेलर को अच्छे रिस्पॉन्स मिल रहे हैं?
खुश हूं कि लोगों को ट्रेलर पसंद आ रहा है। कबीर खान ने जब मुझे फिल्म का प्रस्ताव दिया था तब से मैं काफी एक्साइटेड था। कबीर खान और साजिद नाडियाडवाला भव्य और अच्छी फिल्में बनाते हैं। मैं जासूसी वाली कोई फिल्म करना चाहता था। हमने ‘एजेंट विनोद’ बनाई थी लेकिन वो ज्यादा नहीं चली। कबीर ने ‘एक था टाइगर’ बनाई थी, वो सुपरहिट हुई थी। उम्मीद है कि कबीर निर्देशित ‘फैंटम’ भी दर्शकों को पसंद आएगी।

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आतंकवाद पर पहले भी फिल्में बनी हैं। ‘फैंटम’ कितनी अलग है?
यह मिशन फिल्म है, जो आधी फिक्शन और आधी फैक्ट्स पर आधारित है। 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले को लेकर हमने फैंटेसी फिल्म बनाई है। मिशन हमला पीड़ितों को न्याय दिलाने को लेकर है। इसके लिए ऐसे शख्स को चुना जाता है जिसे आर्मी से निकाल दिया गया था। उसका पिता उससे बात नहीं करता। यह शख्स दानियाल खान है। दानियाल के आगे-पीछे कोई नहीं है। खोए सम्मान को वापस पाने के लिए वह इस सुसाइड मिशन पर जाता है। फिल्म पाकिस्तान के खिलाफ नहीं है, पर जिन्होंने हमले को अंजाम दिया है और उनमें से एक आदमी वहां छुपा हो तो वहां ही जाना पड़ेगा। इसलिए क्लाइमेक्स पाकिस्तान में है। यह ‘बजरंगी भाईजान’ नहीं है। इसका स्वरूप वायलेंट है।

आपको पढ़ने का शौक है। हुसैन जैदी की किताब पढ़ी?
‘डोंगरी टू दुबई’ पढ़ी थी। ‘मुंबई एवेंजर्स’ कबीर ने पढ़ने से मना किया था। उनका कहना था कि फिल्म का स्क्रीन प्ले बेहद अलग है। ऐसा किरदार किताब में है ही नहीं। लिहाजा किताब से किरदार को मदद नहीं मिलेगी।

कभी पाकिस्तान जाना हुआ है?
हां, गया हूं। करीब बीस साल पहले परिवार के सदस्य की शादी में शामिल होने गए थे। पांच-छह साल पहले एक शो करने भी गया था। हमारा परिवार आजादी से पहले से भारत में रह रहा है। विभाजन के बाद कई लोग चले गए थे। परिवार के कुछ लोगों को लगा था कि मुसलमानों के लिए यह सुरक्षित मुल्क नहीं है। वहीं परिवार के कुछ सदस्यों को पाकिस्तान की धर्म आधारित सोसाइटी में रहने का फैसला सही नहीं लगा। उन्होंने सेक्युलर सोसाइटी में रहना पसंद किया। मैं बहुत खुश हूं कि मैं भारत में बस गया।

कबीर के साथ काम का अनुभव कैसा रहा?
बेहतरीन। वह बहुत मेहनत करते हैं। मुश्किल लोकेशन पर शूट करते हैं। फिल्म की शूटिंग लेबनान और बेरूत में हुई है। मुझे भी रियल लोकेशन पर शूट करना पसंद है।

आपने कई एक्शन फिल्में की हैं। रायफल चलाने में कितना एक्सपर्ट हुए?
(हंसते हुए) मुझे लगता है कि थोड़ा बहुत सीख लिया है। इस फिल्म में कई दुर्लभ गन थीं। एक बचपना भी रहा है बंदूकों के साथ चोर पुलिस खेलने का। हमारे यहां शूटिंग में दो-तीन तरह की गन मिलती हैं। वहां ढेरों वैरायटी हैं। हमें असली गन भी मिली थी चलाने के लिए। एके 47, एम 16 जैसी गन चलाई। वहां पर ट्रेनिंग देने के लिए कुछ सैनिक थे।

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फिल्म में मुंबई हमलों के षड्यंत्रकारी हाफिज सईद की क्लिप है। सेंसर बोर्ड की आपत्ति की आशंका नहीं थी?
नाम बदल दिया गया है लेकिन उससे ही प्रेरित है। उसने भारत के खिलाफ जहर उगला है। वह कैरेक्टर बन गया है। नाम बदलने से कुछ होता नहीं, भावना वही रहती है, हालांकि फिल्मों को हमें नियम के तहत ही बनाना होता है।

फिल्म के पाकिस्तान में प्रतिबंधित होने पर वित्तीय असर पड़ेगा?
यह सब्जेक्ट पर निर्भर करता है। निर्माताओं को अंदाजा है कि वहां कुछ लोगों को फिल्म पसंद नहीं आएगी। रिलीज न होने का असर तो होता है, यह करोड़ों का बिजनेस है। पर सबसे बड़ी बात यह है कि जब वे फिल्म नहीं देख पाते तो पायरेसी भी वहीं से शुरू होती है।

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