अतिवादी प्रतिक्रियाएं मिलती हैं रोहित शेट्टी कोे। कुछ उनके घोर प्रशंसक हैं तो कुछ कटु आलोचक। इन दोनों से बेपरवाह रोहित डायरेक्ट करते रहते हैं अपनी पसंद की फिल्में। ‘दिलवाले’ की रिलीज के पहले उन्होंने अपनी शैली और फिल्म के बारे में विस्तार से बातचीत की...

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आपके प्रशंसक चाहते हैं कि आप अपनी शैली की फिल्में बनाते रहें। उनके इस आग्रह के बारे में आप क्या कहेंगे?
ऑफिस के बाहर निकलते ही सार्वजनिक स्थानों पर मुझे अपनी फिल्मों के दर्शक और प्रशंसक मिलते हैं। ‘खतरों के खिलाड़ी’ के बाद लोग मुझे पहचानने लगे हैं। वे मुझसे यही कहते हैं कि आपकी फिल्में मस्त होती हैं। आप वही बनाते रहो। इनमें बच्चे, बुजुर्ग और औरतें होती हैं। इन तीनों ग्रुप के लोग सोशल मीडिया साइट पर नहीं हैं। मैं उनके लिए ही फिल्में बनाता हूं। देश में उनकी तादाद बहुत ज्यादा है। अगर मैं उनके चेहरे पर स्माइल ला सकूं तो इससे बड़ी बात क्या होगी। यही मेरा एजेंडा और मोटिव है। मां-बेटे, बाप-बेटी एक साथ बैठ कर फिल्में देख सकें। उनमें कोई झेंपे नहीं। आप देखेंगे कि मेरी फिल्मों में सोमवार के बाद फैमिली दर्शकों की भीड़ बढ़ती है। वे ही मेरी फिल्म को हिट से सुपरहिट बनाते हैं।
अपने कटु आलोचकों के बारे में क्या कहेंगे? उनकी राय में आपकी फिल्मेें घटिया और हल्का मनोरंजन करती हैं?
घोड़ा रेस में भागता है तो उसकी आंखों पर पट्टी बंधी होती है। वह अगल-बगल कुछ भी नहीं देखता। मैं भी वही करता हूं। आस-पास निगेटिविटी को फटकने नहीं देता। अपनी आलोचना पर पहले गुस्सा आता था। अब मुझे लग गया है कि वे मेरे दर्शक नहीं हैं। हो सकता है कि वे सही हों लेकिन मैं भी गलत नहीं हूं। मैं उनकी मर्जी और पसंद की फिल्में नहीं बना रहा हूं तो वे भड़के रहते हैं। नौ ब्लॉकबस्टर यूं ही या संयोग से नहीं बनतीं। अब तो आलोचक भी लिखने लगे हैं कि रोहित की फिल्म में गाड़ियां उड़ेंगी और फिल्में हिट हो जाएगी।

आप अपनी आलोचना की परवाह नहीं करते? जानने की इच्छा नहीं होती कि कौन क्या लिख रहा है?
अखबार और सोशल मीडिया साइट पर हजारों लोग लिखते होंगे। उनसे क्या घबराना? मैं नए डायरेक्टर और एक्टर को देखता हूं कि वे ट्विटर और फेसबुक के कमेंट और स्टेटस से परेशान रहते हैं। सच कहूं तो वे पूरा हिंदुस्तान नहीं हैं। असल दर्शक तो सीधे सिनेमा देखता है। मैं क्रिटिक की परवाह क्योंं करूं? उनमें से ज्यादातर के आईक्यू और एजेंडा से वाकिफ हूं। मुझे तो लगता है कि वे चिढ़े लोग हैं। उन्हें दीवाली और खुशियों से नफरत है। गौर करें तो मेरी फिल्में एक प्रोडक्ट हैं। हम इस प्रोडक्ट पर कथित संवेदनशील फिल्ममेकर की तरह या उससे ज्यादा मेहनत करते हैं। मेरी फिल्मों के एक्शन सीन में बहुत ज्यादा मेहनत लगती है।

फिल्मों की रिलीज के पहले की एक्टिविटी के बारे में क्या कहेंगे?
पहले के फिल्मकारों का सौभाग्य था कि उनकी फिल्में सीधे थिएटर में जाती थीं। अभी तो इतनी स्कैनिंग होती है। उसे इतने लोग देखते हैं, चर्चा होती है। मेरा मानना है कि दर्शकों को डिसाइड करने दो। मुझे जो आता है, वही करता हूं।

क्या कह सकते हैं कि आपको कामयाबी का फार्मूला मिल गया है?
नहीं, अभी ‘दिलवाले’ आ रही है और मैं डरा हुआ हूं। कहा जा रहा है कि दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। मेरी फिल्म तो तलवार की धार पर ही रहती है। रिलीज के पहले से आलोचना शुरू हो जाती है। रिव्यू में दो स्टार मिलते हैं। आप इसे मेरा धैर्य कहें या कुछ और... सब कुछ सुनते-समझते मैं फ्राइडे को दर्शकों के बीच पहुंचूंगा। मुझे दुख इस बात का होता है कि कोई हमारी मेहनत की सराहना नहीं करता। एक घर में फिल्म बनाना सबसे आसान है। हम जो काम करते हैं, वह बहुत डिफिकल्ट है। मैं इतना ही कहूंगा कि मेरी फिल्में देखने के लिए उस माइंडसेट के साथ आएं। मैं कहता हूं कि मेरे साथ दादर या बांद्रा चलें क्रिटिक। मेरे साथ फिल्म देखें, फिर दर्शकों से बोलें कि फिल्म खराब है। मैं खुला चैलेंज करता हूं कि है दम तो आ जाओ। अगर ऐसा दम नहीं है तो मेरी फिल्म के बारे में मत लिखो। मैं दावा नहीं करता लेकिन मुझे अपने दर्शकों की पसंद का अनुमान है। उनके इमोशन समझ में आने लगे हैं। लोग इसे फार्मूला कहते हैं। मेरे लिए यह वर्क कर रहा है।

आप साजिद-फरहाद के साथ लिखते समय जैसा सोचते हैं, क्या वैसा ही सब कुछ पर्दे पर आ जाता है?
कोशिश तो यही रहती है। कई बार सीन बेहतर हो जाता है। मेरे पास ज्यादातर मंझे हुए एक्टर रहते हैं। कई बार कमजोर होता है तो मैं छोड़ता भी नहीं। सीन के सुर को पकड़ने की कोशिश करता हूं। फिर मैं टेक और दिनों की गिनती नहीं करता। मैं समझौते नहीं करता। अभी मुझे अच्छा बजट मिलता है। मेरी फिल्मों का स्केल दर्शकों के प्यार की वजह से बड़ा होता जा रहा है। एक आम दर्शक अपनी मासिक कमाई का दस प्रतिशत मुझे देता है। मैं भी चाहता हूं कि उसके साथ धोखा न हो।

‘दिलवाले’ में पहली बार आप विदेश गए। ऐसा योग कैसे बना?
कहानी ही ऐसी है। मेरे किरदार विदेश जाते और आते रहते हैं। मैं पहली बार विदेश जा रहा था तो मैंने तय किया कि किसी ऐसे देश चलें, जहां पहले कोई हिंदी फिल्म शूट नहीं हुई हो। बुल्गारिया में हर तरह की सुविधा मिली। हमने शूटिंग में किसी प्रकार की चीटिंग नहीं की। आइसलैंड में ‘रंग दे गेरुआ’ गाने की शूटिंग हुई।

विदेश में फिल्म की शूटिंग के दौरान किन दिक्कतों का सामना हुआ?
आइसलैंड में शूट किया गाना बहुत डिफिकल्ट रहा। रोजाना हम दो घंटों से ज्यादा ट्रैवल करते थे। ठंड बहुत थी। चार लाख की आबादी का देश है। हमें जहां के विजुअल अच्छे लगते थे, हम वहीं ठहर जाते थे। बहुत मंहगी जगह है। गाने में सब कुछ रियल है। हम लोग तो पूरी तरह कवर थे। काजोल ने साड़ी पहन रखी थी। ठंड के हिसाब से शाह रुख के भी कपड़े कम थे। उन्हें हर शॉट के बाद कंबल दिया जाता था। टीम की तकलीफ बढ़ गई थी। एक्शन दृश्यों के लिए मेरी टीम थी, बुल्गाारिया की टीम थी और दक्षिण अफ्रीका से मैंने ‘फियर फैक्टर’ की टीम बुलाई थी। उनके बीच तालमेल बिठाना भी एक काम था। इस बार एक्शन और गानों पर ज्यादा ध्यान दिया है।

आपकी एक टीम बन गई है। कभी ऐसा नहीं लगता कि उसकी वजह से आपकी फिल्मों में एकरसता और ठहराव न दिखने लगे?
उसका दूसरा पहलू है कि मैं अभी किसी को जोड़ूं तो वह दहशत में आ जाएगा। वह कुछ बोल ही नहीं पाएगा। वह इस डर में रहेगा कि कैसे बोलूं, रोहित तो हमेशा सही जाता है। मेरी टीम मुझे बोल देती है, वे साफ बताते हैं। मेरे ऑफिस में कोई भी बेधड़क सुझाव दे देता है। मैं सभी को फिल्म दिखाता हूं। उनसे पूछता हूं। मैंने अपनी फिल्म सभी को दिखा दी है। सबने अपनी बात कही। उनके हिसाब से थोड़ा फेरबदल भी किया।

काजोल और शाह रुख का योग कैसे बना?
फिल्म लिखते समय किसी का ध्यान नहीं था। ‘गोलमाल 3’ खत्म होने के बाद ही फिल्म लिख ली थी। दो भाइयों की कहानी और रोमांस था। इसमें ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ से ज्यादा रोमांस है। रोमांटिक एक्शन फिल्म है। दोनों ने हमेशा प्रूव किया है। दोनों ने अलग-अलग भी काफी सफल काम किया है। दोनों साथ आते हैं तो कुछ मैजिकल हो जाता है। राज कपूर और नरगिस वाली बात नजर आती है। हम भी सीन शूट कर देते थे नॉर्मली लेकिन एडिट में पर्दे पर देखते समय नया चार्म नजर आता था। उन्हें भी नहीं मालूम कि क्या जादू है। कहने के लिए तो कैमिस्ट्री, कंफर्ट जैसी पचास बातें कही जा सकती हैं।

विदेशी करते हैं तारीफ, अपने उड़ाते हैं मजाक

गाड़ी जब उड़ती है, उसे देख कर मजा आता है। हर उड़ती गाड़ी में एक स्टंटमैन बैठा होता है। उस गाड़ी को तैयार करने में तीन दिन लगते हैं। पूरी नापजोख होती है। पेट्रोल है तो आग भी लग सकती है। फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस और डॉक्टर तैनात रहते हैं। गाड़ी को अंदर से तैयार किया जाता है। उसके अंदर केज बनाना पड़ता है। उस केज में ड्राइवर बैठता है। हम लोग यथासंभव इलेक्ट्रॉनिक कनेक्शन निकाल देते हैं, जिससे आग न लगे। पेट्रोल कम से कम रखते हैं। हेलमेट से लेकर बाकी सारी चीजें रहती हैं। हम गाड़ी के अंदर पाइपिंग करते हैं। ड्राइवर को सिकुड़कर अपनी सीट पर जाना पड़ता है। कभी प्लेटफॉर्म तो कभी कैनन से गाड़ी उड़ाई जाती है। रनिंग में गाड़ी पलटती है तो उसके लिए अलग ट्रिक करनी पड़ती है। भारत में उसके दो-तीन एक्सपर्ट हैं। कमाल है कि विदेशी तारीफ करते हैं और अपने लोग मजाक उड़ाते हैं। हमलोग इस पर भी एक फिल्म बना रहे हैं।

अजय ब्रह्मात्मज

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Posted By: Monika Sharma

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