एक साल का लंबा ब्रेक लेने के बाद फिल्म इंडस्ट्री में लौट आए हैं म्यूजिक डायरेक्टर प्रीतम। उनसे अजय ब्रह्मात्मज की अंतरंग बातचीत के अंश...

कुछ समय के लिए आप गायब हो गए थे। कहां और क्यों?
फिल्म ‘धूम’ करने के बाद मैैंने ब्रेक लेने का तय किया। अप्रैल 2014 तक हाथ में लिया काम समेट लिया। सबसे पहले बच्चों को लेकर लंदन गया। छह महीने तक कोई काम नहीं किया। लगातार काम के कारण बोर हो गया था। काम में एनर्जी नहीं मिल रही थी। इसलिए ब्रेक लिया। उस समय कबीर खान ‘बजरंगी भाईजान’ कर रहे थे। अनुराग बसु भी ‘जग्गा जासूस’ की शूटिंग शुरू कर चुके थे। मुझे ब्रेक से लौटकर इन दोनों फिल्मों के लिए काम करना पड़ा। ब्रेक के दौरान मैैंने कई फिल्में छोड़ीं। बड़ी-छोटी जैसी भी फिल्मों के ऑफर मिले, मैैंने साफ मना कर दिया।

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यहां हर आदमी को लगता है, दूसरे काम हमें मिलें। ऐसे में काम से ब्रेक लेने की हिम्मत कहां से मिली?
देखिए, मैैं वर्कोहॉलिक हूं। अपने प्रोफेशन से प्यार करता हूं। मैैं सारा दिन स्टूडियो में काम करता रहता हूं। वर्कोहॉलिक इंसान को जब काम करने का मन नहीं होता है, तो इसका मतलब कोई प्रॉब्लम है। फिर मैैंने सोचा चलो देखते हैैं। थोड़ा आराम करते हैैं। काम से गैप लेने के बाद एक-दो महीने मस्ती में बीते। पुराने दोस्तों से मुलाकात की। म्यूजिक शो किए। उसमें कुछ भी कंपोज नहीं करना पड़ता था। मैैंने तय किया था कि म्यूजिक से जुड़ी हुई कोई चीज नई नहीं करनी है। फ्रेश होकर काम पर वापसी करना चाहता था।

म्यूजिक इंडस्ट्री के ज्यादातर लोग किसी को असिस्ट करते हैैं। आपको साउंड रिकॉर्डिंग की पढ़ाई की जरूरत क्यों महसूस हुई?
मैैं मिडिल क्लास परिवार से हूं। मेरे पिता प्रबोध चक्रवर्ती कोलकाता में छोटा म्यूजिक स्कूल चलाते थे, साथ ही रेलवे में नौकरी करते थे। हमारा म्यूजिक से जुड़ाव रहा है, पर मेरे पिताजी ने म्यूजिक को प्रोफेशन नहीं बनाने का आदेश दिया था। उस समय म्यूजिक में करियर नहीं था। मैंने म्यूजिक को करियर बनाने के बारे में सोचा भी नहीं था। मैैं एमएससी कर चुका था। आईएएस के लिए तैयार हो रहा था। उस दौरान एक मैगजीन में पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट का एड देखा। मैैंने पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में साउंड इंजीनियरिंग के कोर्स में अप्लाई किया। मैैंने घर पर कहा सरकारी इंस्टीट्यूट में इंजीनियरिंग करने जा रहा हूं। पढ़ाई के बाद सरकारी नौकरी मिलेगी, यह सोचकर घर पर सब खुश हो गए थे। मैैंने तो एक-दो साल बाद घर पर कोर्स के बारे में सबको बताया। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट जाकर मेरी लाइफ बदल गई। 1993 से 1996 तक पुणे में रहा।

पुणे में पढ़ाई खत्म कर मुंबई जाने का ख्याल कब आया?
मैं पुणे इंस्टीट्यूट में ही इनहाउस म्यूजिक डायरेक्टर बन गया था। वहां पर एक म्यूजिक टीचर केदार अवती थे, जिनसे मैैंने फिल्म और वेस्टर्न क्लासिक म्यूजिक के बारे में बहुत कुछ सीखा। मुंबई आकर देखा, फिल्म इंस्टीट्यूट के सीनियर पहले से ही यहां काम कर रहे हैं। उनके सहयोग से अपनी पढ़ाई के तीसरे साल में ही मैैंने मुंबई में काम शुरू कर दिया था।

आपका पहला एड या जिंगल कौन सा था?
मेरा एक दोस्त जीटीवी में काम करता था। मैैंने एक स्केच बनाया था। जिसकी लाइन ‘जिंदगी की जरूरत को पूरा करे एशियन स्काय शॉप’ थी। वह पूरा दिन टीवी पर बजता रहता था। वह मेरा पहला एड था। मैैंने कई टीवी शो भी किए हैैं। स्टार परिवार अवॉर्ड की थीम ट्यून भी बनाई थी, जिसका आज भी इस्तेमाल हो रहा है। निर्माता राजू हिरानी के लिए मैैंने बहुत एड किए थे। राजू हिरानी मुझे निर्देशक संजय गढ़वी के साथ मिले थे। संजय गढ़वी के यशराज में मूव करने पर मुझे फिल्म ‘धूम’ मिली। उसके बाद मुझे सब जगह से काम मिलना शुरू हुआ। मैंने हर प्रोडक्शन के साथ काम किया। 100 से अधिक फिल्में कर ली हैं।

पुराने गीतकारों की शिकायत रही हैै कि अब शोर शराबे वाले गाने अधिक बनते हैैं। हमारे जमाने का गाना नहीं रहा। इसकी क्या वजह है? क्या आप लोगों को गाना तैयार करने के लिए समय नहीं दिया जाता?
मुझे ऐसा नहीं लगता। आपको बता दूं अस्सी के दशक में भी कई खराब गाने आए थे। जिनमें से हमें अच्छे गाने याद हैं और खराब गाने हम भूल गए। ठीक वैसा आज भी हैं। जो अच्छा काम कर रहे हैं वे रह जाएंगे। हम भी बूढे़ होकर यहीं कहेंगे, हमारे समय के गाने कितने अच्छे होते थे!

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