नई दिल्ली, अमित कर्ण। अनंत महादेवन 'विक्टोरिया नंबर 203' बनाने के बाद से कंटेंट परक फिल्मों की ओर खुद को शिफ्ट कर चुके हैं।

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नक्सलियों को केंद्र में रख उन्होंने 'रेड अलर्ट' फिर 'सिंधुताई सकपाल' बनाई। लंदन फिल्म फेस्टिवल में उसकी स्क्रीनिंग हुई तो पब्लिक ने उन्हें स्टैंडिंग ओवेशन दिया। उनकी ताजातरीन फिल्म 'गौर हरि दास्तान' है। उसकी इंडिया स्क्रीनिंग छठे जागरण फिल्म फेस्टिवल में गुरुवार की शाम को हुई।

जागरण फिल्म फेस्टिवल के एसोसिएशन से खुश व संतुष्ट अनंत महादेवन ने कहा, ''गौर हरि दास्तान' जैसी फिल्मों के प्रमोशन का बजट बहुत ज्यादा नहीं होता। ऐसे में उनके लिए माकूल माहौल फिल्म फेस्टिवल तैयार करते हैं। मैं जागरण फिल्म फेस्टिवल का शुक्रगुजार हूं। यहां से इस फिल्म के बारे में लोगों को जागरूक करने में बड़ी सफलता मिलेगी। हम तकनीकी वजहों से कान्स फिल्म फेस्टिवल में नहीं जा सके। वहां की दिक्कत यह थी कि वहां दुनियाभर से 4000 फिल्में आती हैं। ज्यूरी आप की फिल्म देखे, वह आप को सुनिश्चित करना होता है। उसके लिए आप के नाम की चर्चा उस सर्किट में होनी चाहिए। अनुराग कश्यप व उनके बैनर फैंटम का नाम काफी पुराना है। कान्स में लोग उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं, इसलिए मसान दिखाने में उन्हें दिक्कत नहीं हुई। अब देखिए कान्स में चर्चित रहने के चलते भारत समेत दुनिया के अन्य इलाकों में उस फिल्म के प्रति अच्छा माहौल है। हमें भी उम्मीद है कि जागरण जैसे बड़े फिल्म फेस्टिवल से हमें बड़ी ऑडिएंस मिल सकेगी।'
'गौर हरि दास्तान' एक ऐसी कहानी है, जिसे लोगों के लिए जानना बेहद जरूरी है। वे स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने देश की आजादी के लिए जंग लड़ी, मगर देश जब आजाद हुआ तो उन्हें अपने सम्मान के लिए फिर से लड़ाई लडनी पड़ी। उस लड़ाई का तरीखा बड़ा अलहदा था। उन्होंने उसकी खातिर रामलीला मैदान में कोई अनशन नहीं किया। भूख हड़ताल पर नहीं गए। तीस सालों तक वे शांति से पूरी सहनशीलता के साथ जंग लड़ी। तीन दशकों तक वे अनवरत इसलिए लड़ते रहे, क्योंकि उनका दिल गवाही नहीं दे रहा था कि हम आजाद होकर भी सिस्टम के गुलाम है। वैसी सहनशक्ति आज की तारीख में लोगों के पास नहीं है। गौर हरि दास की कहानी हमें प्रेरित करती है कि इस्पाती इच्छाशक्ति व सहनशक्ति का होना जिंदगी में काफी जरूरी है।'

उन्होंने आगे कहा, 'लिहाजा मुझे अन्ना हजारे की जंग से ज्यादा गौर हरि दास जैसे अनसंग हीरो की कहानी भाई। अन्ना हजारे भी वॉरियर हैं, मगर उन्होंने जिन इरादों के साथ जंग की शुरूआत की थी, उससे वे अब उसमें कमजोर पड़ चुके हैं। मैं ही क्या इस फिल्म से जो लोग जुड़े, सभी को उनकी कहानी भा गई। वे ऑस्कर विजेता साउंड रिकॉर्डिस्ट रसेल पुकुट्टी हों या पंडित जसराज, जिन्होंने फिल्म के लिए 'वैष्णव जन' कमपोज किया। एल. सुब्रह्मण्यन जिन्होंने मीरा नायर की 'सलाम बॉम्बे' के बाद किसी फिल्म को म्यूजिक ही नहीं दिया, उन्हें इस फिल्म की कहानी भाई और वे फिल्म में हमारा हिस्सा बने। हम लॉस एंजिल्स गए और वहां 'वैष्णव जन' कंपोज किया। रसेल पुकुट्टी ने साउंड का ठीक वैसा माहौल क्रिएट किया, जैसा आजादी के समय होता था। मुझे पूरा विश्वास है, यह फिल्म मास व क्लास दोनों को पसंद आएगी।

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Posted By: Monika Sharma

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