मुंबई, प्रियंका सिंह। शक्तिस्वरूपा हैं मां दुर्गा। हर स्त्री में उनका अंश है। कोई भी कार्य उसकी हिम्मत और हौसले के आगे मुश्किल नहीं। इसी को चरितार्थ करती हैं मनोरंजन जगत में पर्दे के पीछे काम करने वाली प्रतिभाएं। पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में न सिर्फ उन्होंने प्रवेश किया, बल्कि अपनी काबिलियत को साबित करते हुए प्रशंसा भी पाई। पूरी फिल्म को अपने कैमरे के लैंस से दिखाने वाली महिला सिनेमेटोग्राफर्स की चुनौतियों, इस पेशे से लगाव और युवा लड़कियों के इस पेशे में आने की पड़ताल कर रही हैं प्रियंका सिंह...

हिंदी सिनेमा की शुरुआत में पर्दे के पीछे काम करने वाली महिलाओं की संख्या नगण्य होती थी। पिछली सदी के सातवें दशक तक इसमें कोई खास बदलाव नहीं दिखा। अब लेखन से लेकर निर्देशन में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। वहीं सिनेमेटोग्राफी की बात करें तो बी आर विजयलक्ष्मी भारत की ही नहीं, बल्कि एशिया की पहली सिनेमेटोग्राफर रही हैं, जिन्होंने वर्ष 1980 में कैमरा की कमान संभाली और अशोक कुमार अभिनीत तमिल फिल्म में बतौर असिस्टेंट शुरुआत की। इस पेशे में महिलाओं के लिए चुनौतियां कई हैं।

फिल्म ‘बधाई दो’ में सेकेंड यूनिट सिनेमेटोग्राफर अर्चना घांग्रेकर कहती हैं कि इस पेशे में वक्त का कोई ठिकाना नहीं होता है, रात में कई बार अकेले घर आना पड़ता है, लेकिन मैं इसे संघर्ष नहीं मानती। अपने काम के लिए जुनून हो तो घर और काम के बीच संतुलन कायम करना मुश्किल नहीं होता।’ बांग्ला फिल्म ‘रितुपर्णो घोष’ और ‘बंटी और बबली’ में कैमरा टीम का हिस्सा रहीं रेश्मि सरकार कहती हैं, ‘क्रिएटिविटी पर किसी जेंडर का निजी हक नहीं है। अब सिनेमेटोग्राफर शब्द कॉमन है, पहले कैमरामैन कहा जाता था। कैमरापर्सन या डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी कहलाने में वक्त लगा। सिनेमा की भाषा वैश्विक है। मैं एक मलायलम फिल्म से बतौर एसोसिएट जुड़ी थी। मैंने इशारों में समझाना शुरू किया और काम आसानी से हो गया।’

कमजोरी नहीं, पसंद की बात है

युद्ध पर आधारित फिल्मों की शूटिंग मुश्किल मानी जाती है। हाल ही में सिनेमेटोग्राफर प्रिया सेठ ने ‘पिप्पा’ फिल्म की शूटिंग पूरी की है। यह फिल्म साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 45वें कैवेलरी टैंक स्क्वाड्रन का हिस्सा रहे ब्रिगेडियर बलराम मेहता के जीवन पर आधारित है। इससे पहले वह अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ शूट कर चुकी हैं। वह अंडरवॉटर शूटिंग में भी माहिर हैं। प्रिया कहती हैं, ‘वर्ष 1997 में जब मैंने काम करना शुरू किया था, तब देश में दो-तीन लड़कियां ही इस क्षेत्र में थीं। अब यह संख्या बढ़कर 100 से अधिक हो गई है, लेकिन आज भी महिला सिनेमेटोग्राफर को मुख्यधारा वाली फिल्मों में मौके उतनी आसानी से नहीं मिलते हैं, जितने पुरुषों को मिल जाते हैं। ‘एयरलिफ्ट’ की सफलता के बाद भी मुझे काम के लिए बहुत कॉल्स नहीं आए थे, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी लड़ते रहना महिलाओं को आता है। मुख्यधारा वाले सिनेमा में महिला सिनेमेटोग्राफर को मौका मिलेगा तो कहानियों को कहने का तरीका भी बदलेगा। यही वजह है कि हमने साल 2017 में इंडियन वुमन सिनेमेटोग्राफर्स कलेक्टिव समुदाय बनाया, ताकि नई लड़कियां जो इस क्षेत्र में आ रही हैं, उनके लिए सुविधा हो, वे अपना नेटवर्क बना पाएं।’

वहीं पिछले साल शॉर्ट फिल्म

‘सोंसी’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सविता सिंह कहती हैं, ‘मैं पहली महिला थी जिसे साल 2009 में भी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके एवज में मुझे इज्जत मिली, लेकिन काम उतना नहीं मिला। यही वजह है कि आगे की पीढ़ी के लिए हम रास्ते बना रहे हैं।’

लिंगभेद से लड़ते हुए आगे बढ़ना है

महिलाओं की संख्या इस पेशे में कम होने को लेकर रेश्मि कहती हैं, ‘सिनेमेटोग्राफी स्क्रिप्ट से जुड़ी होती है। अगर डरावनी फिल्म हैं तो डरावने दृश्य शूट करने ही होंगे। कला में महिला-पुरुष का अंतर लाना सही नहीं। ‘बंटी और बबली’ के सेट पर सिनेमेटोग्राफी में कोई लड़की नहीं थी। महिलाएं मानसिक तौर पर मजबूत होती हैं, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में आकर एहसास हुआ कि यहां लड़कियों को शारीरिक तौर पर कमजोर समझा जाता है। कैमरा लड़कों के लिए जितना भारी है, उतना ही हमारे लिए भी है, लेकिन उसके आधार पर कमजोर समझना गलत है। गांव की महिलाएं पानी का घड़ा लेकर मीलों चलती हैं। सामान से भरा थैला लेकर घर आती हैं, तब लोगों को एहसास नहीं होता कि हम कमजोर हैं।’ इस संबंध में प्रिया कहती हैं, ‘यह तकनीकी जॉब है तो कई बार पूरी फिल्म महिलाओं के हाथों में देने से मेकर्स भी डरते हैं। वे भूल जाते हैं कि घर को संभालने वाली महिलाएं मल्टी टास्किंग हैं। इस मसले पर अर्चना कहती हैं, ‘महिला और पुरुष के बीच शारीरिक ताकत का अंतर नेचुरल है। कैमरापर्सन का काम शारीरिक और मानसिक तौर पर थका देने वाला काम है। इसके लिए आपको कमर, पीठ, बाजूओं और कंधों को मजबूत बनाने के लिए व्यायाम करना होगा। लिंग का क्रिएटिविटी से लेना-देना नहीं है। डिजिटल प्लेटफार्म की वजह से इस क्षेत्र में इतनी आजादी है कि अब यह कोलेबोरेशन वाला काम हो गया है। जितने ज्यादा दिमाग साथ काम करेंगे, वे बेहतर रिजल्ट देंगे।’

एक-दूसरे का सपोर्ट जरूरी

अपना वर्चस्व इस क्षेत्र में स्थापित करने को लेकर सविता कहती हैं, ‘बदलाव तब होगा, जब ज्यादा से ज्यादा महिलाएं साथ आएंगी। कई लोग अब भी कहते हैं कि यह पुरुषों की दुनिया है, लेकिन मेरा मानना है कि सिनेमा एक निजी दुनिया है। लोग उसी के साथ काम करना चाहते हैं, जिसके साथ वे काम करने में सहज होते हैं। ऐसे में जेंडर भी एक साइकोलॉजिकल दीवार खड़ी कर देता है। चीजें बदल रही हैं, लेकिन सफर लंबा है। ज्यादा महिलाएं साथ आएंगी तो प्रतिस्पर्धा होगी, काम ज्यादा होगा। डिजिटल प्लेटफार्म के आने से काम बढ़ा है। हमारी संख्या और काम दोनों बोलेगा। एक महिला को दूसरी महिला को सपोर्ट करना होगा। महिला निर्देशकों को आगे आकर महिला सिनेमेटोग्राफर को काम देना होगा। यहां जेंडर की बात नहीं है, लेकिन कम से कम हमें बराबरी का मौका तो मिले।’

समान अवसर पाने की कोशिशें

इस पेशे से जुड़ी महिलाओं का मानना है कि हम आपस में जब तक पारदर्शिता नहीं लाएंगे, तब तक बदलाव संभव नहीं है, फिर चाहे वह काम पाना हो या फीस को लेकर बराबरी हो। प्रिया कहती हैं, ‘मैं काम लेते वक्त अपनी फीस को लेकर स्पष्ट रहती हूं। कई बार हम पैसों के लिए काम करते हैं, कई बार प्रोजेक्ट पसंद आता है, इसलिए भी कर लेते हैं। मेरे ही स्तर के पुरुष सिनेमेटोग्राफर को मुझसे 15-20 प्रतिशत ज्यादा फीस मिलती होगी।’ इस बाबत सविता कहती हैं, ‘इंडस्ट्री के पूरे काम का केवल दो प्रतिशत काम ही महिला सिनेमेटोग्राफर के पास पहुंचता है। अमेरिका और यूरोप में सिनेमेटोग्राफर के लिए यूनियन यह तय करते हैं कि क्रू में फलां संख्या में महिलाओं का होना जरूरी है। दुर्भाग्यवश हमारे यहां ऐसा नहीं है। दूसरे क्षेत्रों की तरह कला के क्षेत्र में कोई तय मानदंड नहीं है कि किस काम की फीस क्या होगी। आपका काम कितना हिट हुआ है, उसके मुताबिक काम मिलता है। पुरुषवादी सोच की वजह से ऐसा है। लिहाजा फीस और संख्या तब बढ़ेगी जब हम साथ आएंगे। युवा लड़कियों को सपोर्ट करेंगे।’

महिलाएं दूसरे लेंस से नहीं देखतीं

कई बार अभिनेत्रियां जब कोई सीन करने में सहज नहीं होती हैं, तो महिला सिनेमेटोग्राफर को बुलाया जाता है। खुद लिंगभेद का सामना कर रहीं महिला सिनेमेटोग्राफर सीन को केवल एक लेंस से देखती हैं। प्रिया सेठ ‘एयरलिफ्ट’ का वाक्या बताते हुए कहती हैं, ‘फिल्म में एक आइटम गाना था। कैमरा डांसर के शरीर के नजदीक ले जाकर शॉट लेना था। मैंने कहा कि मैं ऐसे शूट नहीं करूंगी। आप बताएं क्या शॉट चाहिए, मैं अपने तरीके से करूंगी।’ इस संबंध में सविता सिंह कहती हैं, ‘कई प्रोजेक्ट मुझे इसलिए दिए जाते हैं, क्योंकि मैं महिला हूं। कई बार उल्टा भी होता है, पहली मीटिंग में पता चल जाता है कि शायद मेकर्स जो छवि चाहते हैं, वह मैं अपने कैमरे से नहीं दिखा पाऊंगी। सबसे ज्यादा आजादी तब महसूस होती है, जब मैं महिलाओं से घिरे सेट

पर होती हूं। मुझे किसी और लेंस से नहीं देखा जाता है।’

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